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'पैसों से सेटलमेंट के बाद खत्म नहीं कर सकते यौन उत्पीडन का केस...', आखिर हाई कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा?

यौन उत्पीडन के एक केस की सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि न्याय बिकाऊ नहीं है. कोर्ट ने बलात्कार के आरोपी एक व्यक्ति की याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की. दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि महिला ने झूठे आरोप लगाए हैं और झूठी प्राथमिकी दर्ज कराई है, तो उसे परिणाम भुगतने होंगे.

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'पैसों से सेटलमेंट के बाद खत्म नहीं कर सकते यौन उत्पीडन का केस...', आखिर हाई कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा?
Courtesy: Social Media

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक केस की सुनवाई करते हुए कहा कि यौन हिंसा के मामलों को पैसे के भुगतान के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा करने का अर्थ होगा कि 'न्याय बिकाऊ' है. हाई कोर्ट ने बलात्कार के आरोपी एक व्यक्ति की याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की, जिसमें एक महिला द्वारा दर्ज की गई एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई थी. महिला का कहना था कि मामला दोनों पक्षों के बीच सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लिया गया था और वह 1.5 लाख रुपये में अपने दावों का निपटान करने के लिए सहमत हो गई हैं. 

एक जुलाई के आदेश में न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की एकल पीठ ने कहा, यह न्यायालय देखता है कि वर्तमान मामले में लगातार अत्यधिक यौन हिंसा की घटनाएं सामने आई हैं और यह तथ्य भी सामने आया है कि आरोपी ने खुद को तलाकशुदा बताया था और शादी का झूठा बहाना बनाकर उसके साथ यौन हिंसा और यौन संबंध बनाए थे. एफआईआर में न केवल यौन हिंसा का आरोप लगाया गया है, बल्कि उनके रिश्ते के अनुचित वीडियो और फोटो बनाने और उसे और उसके बेटे को जान से मारने की धमकी देने और आरोपी द्वारा बार-बार गलत बयानी करने का भी आरोप लगाया गया है.

झूठा झांसा देकर यौन संबंध बनाया

आरोप लगाने वाली महिला एक अकेली मां है. उसने एक शख्स पर आरोप लगाया था कि उसने खुद को तलाकशुदा बताया था और शादी का झूठा झांसा देकर उसके साथ यौन हिंसा और यौन संबंध बनाए थे. अपने आदेश में न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि एफआईआर में महिला और उसके बच्चे के लिए आत्मसम्मान, जीवन और मृत्यु के मुद्दों पर प्रकाश डाला गया है. न्यायालय ने यह भी नोट किया कि पार्टियों द्वारा किया गया समझौता ज्ञापन (एमओयू) पारिवारिक हस्तक्षेप के माध्यम से गलतफहमियों के समाधान का परिणाम नहीं है, बल्कि 12 लाख रुपये की राशि का लेन-देन है, जिसका उद्देश्य एफआईआर को रद्द करना है. 

अदालत ने कहा कि वह ऐसी स्थिति का सामना कर रही है, जहां आरोपी 12 लाख रुपये का भुगतान करना चाहता है, और महिला यौन हिंसा और धमकियों के गंभीर आरोपों से भरी एफआईआर को रद्द करने के लिए इसे स्वीकार करना चाहती है. इन परिस्थितियों में यह न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि वर्तमान मामला माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एफआईआर को रद्द करने के लिए निर्धारित सिद्धांतों के अंतर्गत नहीं आता है. धारा 376 के तहत अपराध बड़े पैमाने पर समाज के खिलाफ एक गंभीर अपराध है. 

झूठी एफआईआर पर परिणाम भुगतने होंगे

जस्टिस शर्मा ने यह भी कहा कि अगर महिला ने झूठे आरोप लगाए हैं और झूठी एफआईआर दर्ज कराई है, तो उसे परिणाम भुगतने होंगे. जस्टिस शर्मा ने कहा कि यह मामला एफआईआर को रद्द करने लायक नहीं है, लेकिन यह तय करने के लिए ट्रायल की जरूरत है कि आरोपी ने अपराध किया या महिला ने झूठी शिकायत दर्ज कराई है.