हरीश राणा मामले पर आज आएगा सुप्रीम कोर्ट का फैसला, क्या भारत में पहली बार मिलेगी इच्छामृत्यु की इजाजत?
सुप्रीम कोर्ट आज हरीश राणा के मामले पर सुनवाई करने वाली है. जिसमें परिवार द्वारा मांगे गए पैसिव यूथेनेशिया या दया मृत्यु की मांग पर अपना फैसला तय करेगी.
नई दिल्ली: हरीश राणा और उनके परिवार के लिए पिछले 13 सालों से समय थमा हुआ है. दिल्ली का रहने वाले यह व्यक्ति 2013 से कोमा में है, हर एक सांस के लिए राणआ को ट्यूब पर निर्भर रहता है. लेकिन उनके इस कष्ट को देखते हुए उनके परिवार वालों ने दूसरी बार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा कर पैसिव यूथेनेशिया या दया मृत्यु की मांग की.
हरीश राणा का परिवार दिसंबर 2025 में दूसरी बार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. उनके इस अपील पर सुप्रीम कोर्ट आज यानी गुरुवार को आखिरी फैसला लेगी. जिसमें यह बताया जाएगा कि हरीश की धीमी और दर्दनाक जिंदगी को और लंबा खींचा जाएगा या फिर उन्हें मरने का अधिकार दिया जाएगा. अगर सुप्रीम कोर्ट लाइफ-सपोर्ट ट्रीटमेंट हटाने की मंज़ूरी देता है, तो यह 2018 में कानूनी होने के बाद भारत में पैसिव यूथेनेशिया का पहला ज्ञात मामला होगा.
आर्थिक परेशानियों का सामना कर रहा परिवार
हरीश के 13 सालों से बिस्तर पर होने की वजह से उसके परिवार की दुनिया बिस्तर तक सिमट गई. इसके अलावा परिवार की आर्थिक स्थिति भी खराब हो गई. पैसों की कमी होने की वजह से हरीश के माता-पिता ने दिल्ली के महावीर एन्क्लेव में अपना घर बेच दिया और गाजियाबाद चले गए. हालांकि धीरे-धीरे हरीश के ठीक होने की उम्मीद खत्म हो गई. जिसके बाद 2024 में उनके परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
भारत में कैसे मिली यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता
पैसिव यूथेनेशिया को पहली बार 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा शानबाग मामले में मान्यता दी थी. शानबाग मुंबई में एक नर्स थी, जिस पर 1973 में एक वार्ड बॉय ने यौन हमला किया था, जिससे वह 42 सालों तक कोमा में रही. आखिरकार 2015 में निमोनिया से उनकी मौत हो गई. तीन साल बाद, सुप्रीम कोर्ट ने कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता दी.
यूथेनेशिया का मतलब है किसी लाइलाज बीमारी से होने वाले दर्द से राहत देने के लिए जानबूझकर किसी की ज़िंदगी खत्म करना. यह 'एक्टिव' या 'पैसिव' हो सकता है. जबकि एक्टिव यूथेनेशिया, जिसमें दवाओं या इंजेक्शन से मौत दी जाती है. पहले यह भारत में गैर कानूनी था.
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