'सभी SIR ऑर्डर एकमत, फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं...' सुप्रीम कोर्ट में CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका पर EC
चुनाव आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है.
वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 को लेकर उठे सवालों पर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दिया है. आयोग ने उन आरोपों को खारिज किया है, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर अन्य चुनाव आयुक्तों की मंजूरी के बिना फैसले लेने का आरोप लगाया गया था. आयोग का कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े सभी तीन आदेशों को तीनों सदस्यों ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी थी.
कानून के अनुसार ही लिया जाता है फैसला
सोमवार, 26 अक्टूबर को दाखिल हलफनामे में आयोग ने कहा कि याचिका मुख्य रूप से एक मीडिया रिपोर्ट पर आधारित है. यह जवाब मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से संयुक्त रूप से दाखिल किया गया है. आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी अधिकारी या आयुक्त की राय को अपने आप आयोग का आधिकारिक फैसला नहीं माना जा सकता. निर्णय कानून में तय प्रक्रिया के अनुसार ही लिया जाता है.
चुनाव आयोग के मुताबिक, 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को जारी SIR संबंधी तीनों आदेशों को आयोग के तीनों सदस्यों ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी थी.
कैसे लिया जाता है चुनाव आयोग में फैसला?
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि फाइल पहले एक चुनाव आयुक्त, फिर दूसरे चुनाव आयुक्त और अंत में मुख्य चुनाव आयुक्त के पास जाती है. मंजूरी मिलने के बाद फैसले को आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज किया जाता है और संबंधित सदस्यों के हस्ताक्षर लिए जाते हैं. इसके बाद आयोग का सचिवालय अधिसूचना जारी कर निर्णय लागू कराता है. आयोग के अनुसार, केवल किसी अधिकारी का सुझाव या सवाल आधिकारिक निर्णय नहीं होता.
फॉर्म 6 में बदलाव के आरोप पर क्या कहा?
फॉर्म 6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है. आयोग ने इसे SIR संबंधी आदेशों के जरिए बदलने के आरोप को खारिज किया. उसका कहना है कि फॉर्म 6 में संशोधन करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है. हालांकि, आयोग ने माना कि ऑनलाइन पोर्टल पर फॉर्म 6 और घोषणा पत्र को इस तरह दिखाया गया था कि लोगों को फॉर्म में बदलाव होने का भ्रम हो सकता था.
घोषणा पत्र और आवेदन को किया गया अलग
आयोग के अनुसार, 21 अक्टूबर से आवेदन फॉर्म और घोषणा पत्र को अलग-अलग दस्तावेज के रूप में रखा गया है. उसने यह भी स्पष्ट किया कि जिन मतदाताओं का रिकॉर्ड उपलब्ध विवरणों से मेल नहीं खाता, उन्हें हर स्थिति में सुनवाई के लिए बुलाना अनिवार्य नहीं है. ऐसे मतदाताओं से जरूरी दस्तावेज जुटाने के लिए बूथ लेवल अधिकारी (BLO) उनके घर जा सकते हैं.
मतदाता सूची से नाम हटाने पर भी दी सफाई
आयोग ने कहा कि मतदाता पंजीकरण अधिकारी (ERO) के आदेश के बिना ECINet पर किसी मतदाता का नाम न तो जोड़ा जाता है और न ही हटाया जाता है. गोवा के 97 कथित रूप से छूटे मतदाताओं के मामले में आयोग ने बताया कि 88 के नाम पहले से सूची में थे, छह विदेश में थे और तीन के पास पुर्तगाली पासपोर्ट थे. आयोग ने दशहरा अवकाश के कारण फिलहाल संक्षिप्त जवाब दिया है और विस्तृत जवाब दाखिल करने की अनुमति मांगी है.