ट्रंप को टैरिफ पर खरी-खोटी सुनाने के बाद एस जयशंकर ने की पुतिन से मुलाकात
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा, "हम रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदार नहीं हैं, बल्कि चीन है. हम एलएनजी के सबसे बड़े खरीदार नहीं हैं, बल्कि यूरोपीय संघ है. हम वह देश नहीं हैं जिसका 2022 के बाद रूस के साथ व्यापार में सबसे बड़ा उछाल आएगा.
विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर अपनी तीन दिवसीय मॉस्को यात्रा के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की और विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ व्यापक चर्चा की. इस मुलाकात का उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा करना और इस साल के आखिर में होने वाले वार्षिक शिखर सम्मेलन की आधारशिला रखना था. जयशंकर ने रूस के साथ भारत के "विशेष रणनीतिक साझेदारी" को मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई.
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने आगे कहा, "आज की बैठक हमें हमारे राजनीतिक संबंधों और द्विपक्षीय सहयोग पर चर्चा करने का अवसर देती है... हम अब वर्ष के अंत में होने वाले वार्षिक शिखर सम्मेलन की तैयारी कर रहे हैं. हमारे नेताओं ने हमेशा हमें अपनी विशेष रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए मार्गदर्शन दिया है.
रूसी तेल आयात पर अमेरिकी टैरिफ की आलोचना
एस जयशंकर ने गुरुवार (21 अगस्त) को मॉस्को में लावरोव के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में रूसी तेल आयात को लेकर अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर लगाए गए भारी टैरिफ की आलोचना की. उन्होंने भारत को अनुचित रूप से निशाना बनाने का आरोप लगाया. जयशंकर ने कहा, "हम रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदार नहीं हैं, वह चीन है. हम LNG के सबसे बड़े खरीदार नहीं हैं, वह यूरोपीय संघ है. हम 2022 के बाद रूस के साथ कारोबार में सबसे बड़ी बढ़ोत्तरी वाला देश भी नहीं हैं.
मुझे लगता है कि कुछ देश दक्षिण में हैं. हम वह देश हैं जहां अमेरिकियों ने पिछले कुछ सालों से कहा है कि हमें वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर करने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए, जिसमें रूस से तेल खरीदना भी शामिल है। वैसे, हम अमेरिका से भी तेल खरीदते हैं, और वह मात्रा बढ़ी है. इसलिए, ईमानदारी से कहूं तो, हम उस तर्क से बहुत हैरान हैं जिसका आप (मीडिया) ने जिक्र किया.
कारोबार असंतुलन पर जयशंकर ने जताई चिंता
जयशंकर ने 26वें भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग (IRIGC-TEC) की बैठक की सह-अध्यक्षता की, जिसे उन्होंने वार्षिक शिखर सम्मेलन की तैयारी के लिए "महत्वपूर्ण तंत्र" बताया. उन्होंने द्विपक्षीय व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि के बावजूद कारोबार असंतुलन पर चिंता जताई. "पिछले 4 सालों में, जैसा कि आपने जिक्र किया, हमारा द्विपक्षीय व्यापार 2021 में 13 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2024-25 में 68 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है, और यह बढ़ता जा रहा है.
हालांकि, इस बढ़ोत्तरी के साथ एक बड़ा व्यापार असंतुलन भी आया है; यह 6.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 58.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है, जो लगभग नौ गुना है. इसलिए हमें इसे तत्काल संबोधित करने की आवश्यकता है." उन्होंने रूसी कंपनियों से भारतीय समकक्षों के साथ अधिक गहन सहयोग करने और गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करने की अपील की.
वैश्विक मंचों पर सहयोग
रूसी विदेश मंत्री लावरोव ने जयशंकर का स्वागत करते हुए बदलते वैश्विक परिदृश्य पर जोर दिया. उन्होंने कहा, "यह एक बहुध्रुवीय अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रणाली है जिसमें SCO, BRICS और G20 की भूमिका बढ़ रही है... मुझे आज की वार्ता से पॉजिटिव परिणामों की उम्मीद है." रूसी उप-प्रधानमंत्री डेनिस मंटुरोव ने बताया कि पिछले पांच सालों में भारत-रूस व्यापार 700% बढ़ा है, जिससे नई दिल्ली मॉस्को के शीर्ष तीन व्यापारिक साझेदारों में शामिल हो गया है.
रूसी दूतावास ने X पर पोस्ट किया, जिसमें रूसी उप-प्रधानमंत्री डेनिस मंटुरोव ने विदेश मंत्री जयशंकर के साथ बैठक के बाद कहा, "रूस-भारत व्यापार कारोबार पिछले 5 सालों में 700% बढ़ा है. भारत अब रूस के टॉप 3 व्यापारिक साझेदारों में है.
क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा
जयशंकर ने क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों, विशेष रूप से यूक्रेन, पश्चिम एशिया, मध्य पूर्व और अफगानिस्तान पर चर्चा की। उन्होंने कहा, "भारत का दृष्टिकोण संवाद और कूटनीति पर जोर देता है।" उन्होंने रूसी सेना में भारतीय नागरिकों की सेवा के मुद्दे को भी उठाया, जिसमें कई लोग रिहा हो चुके हैं, लेकिन कुछ मामले अभी भी लंबित हैं। जयशंकर ने उम्मीद जताई कि रूसी पक्ष इसे शीघ्र हल करेगा.
ऐतिहासिक सम्मान और सांस्कृतिक जुड़ाव
अपनी यात्रा के दौरान, जयशंकर ने मॉस्को के 'टॉम्ब ऑफ द अननोन सोल्जर' पर पुष्पांजलि अर्पित की, जो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सोवियत सैनिकों के बलिदान को समर्पित है. यह युद्ध जून 1941 में नाज़ी जर्मनी के आक्रमण के साथ शुरू हुआ और मई 1945 में जर्मनी के आत्मसमर्पण के साथ समाप्त हुआ. उन्होंने भारत-रूस बिजनेस फोरम को भी संबोधित किया, जहां उन्होंने 'मेक इन इंडिया' पहल के तहत रूसी कंपनियों को भारत में निवेश के लिए आमंत्रित किया.