BMC चुनाव हार गईं 'डैडी' की दोनों बेटियां, अरुण गवली परिवार के वर्चस्व पर परिणामों ने लगाया पूर्ण विराम

बीएमसी चुनाव के परिणामों ने जहां ठाकरे परिवार के दशकों पुराने वर्चस्व को खत्म कर दिया है, वही  गैंगस्टर से नेता बने अरुण गवली की बेटियों को भी इस चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा है.

Social Media
Kanhaiya Kumar Jha

नई दिल्ली: बीएमसी चुनाव के परिणामों में बीजेपी और शिवसेना(शिंदे) की जोड़ी ने जहां एक तरफ ठाकरे ब्रदर्स के राजनीतिक अस्तित्व को पूरी तरह से खत्म कर दिया है वही इस चुनाव में गैंगस्टर से नेता बने अरुण गवली की बेटियों को भी बड़ा झटका लगा है और उन्हें हार का सामना करना पड़ा है. उनकी दोनों बेटियां, गीता और योगिता गावली चुनाव हार गईं हैं.

बता दें कि, बीएमसी चुनाव के परिणामों ने ठाकरे ब्रदर्स की राजनीति पर एक तरह से पूर्ण विराम लगा दिया है. इस चुनाव में अपना खोया हुआ प्रभुत्व पुनः हासिल करने के लिए राज ठाकरे ने वर्षों पुराने गीले-शिकवे भुला दिए और उद्धव ठाकरे के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, लेकिन मुंबई की जनता ने इस जोड़ी को पूरी तरह खारिज करते हुए मुंबई की कमान बीजेपी को सौंपी है. परिणामों ने बीएमसी में 28 साल पुराने ठाकरे परिवार के वर्चस्व को भी खत्म कर दिया है, जिसके बाद अब उद्धव की राजनीतिक करियर पर भी तमाम तरह के सवाल खड़े होने लगे हैं. राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो चुनाव परिणामों ने एक बार फिर इस बात पर मुहर लगा दी है, कि एकनाथ शिंदे की शिवसेना ही असली शिवसेना है.

गवली की दोनों बेटियों को किसने हराया?

बात अगर गैंगस्टर से नेता बने अरुण गवली की दोनों बेटियों के करें तो भायखला के वार्ड 212 में गीता गवली को समाजवादी पार्टी की अमरीन शहजान अब्राहानी ने हराया. वही वार्ड 207 में योगिता गवली बीजेपी के रोहिदास लोखंडे से हार गईं. दोनों की हार से मुंबई में अरुण गवली परिवार की चली आ रही वर्चस्व भी खत्म होती नजर आ रही है. बता दें कि दोनों बहने अरुण गवली की पार्टी अखिल भारतीय सेना की तरफ से चुनावी मैदान में उतरी थीं.

कौन है अरुण गवली?

अरुण गवली एक खूंखार गैंगस्टर था जिसने 1970 के दशक में मुंबई अंडरवर्ल्ड में कदम रखा था. वह और उसका भाई किशोर 'बायकुला कंपनी' नाम के एक क्रिमिनल गैंग का हिस्सा थे, जो सेंट्रल मुंबई के बायकुला, परेल और सात रास्ता इलाकों में एक्टिव था. अरुण गवली ने 1988 में गैंग की कमान संभाली और 80 के दशक के आखिर और 90 के दशक में अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के गैंग के साथ पावर स्ट्रगल में शामिल रहा.

'ठाकरे' के पॉलिटिकल सपोर्ट से राजनीति में हुई एंट्री

1980 के दशक में, उसे शिवसेना के मुखिया बालासाहेब ठाकरे का पॉलिटिकल सपोर्ट मिला. लेकिन 1990 के दशक के बीच में शिवसेना से मनमुटाव के बाद, उसने अपनी खुद की पॉलिटिकल पार्टी बनाई और 2004 से 2009 के बीच चिंचपोकली सीट से MLA रहा. अरुण गवली को 2008 में मुंबई के एक शिवसेना कॉर्पोरेटर के मर्डर के आरोप में जेल हुई थी. पिछले सितंबर में 17 साल जेल में रहने के बाद उसे बेल पर रिहा किया गया.