नई दिल्ली: ईरान से हजारों किलोमीटर दूर इजराइल भारत के पूर्वोत्तर में 'ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन' नाम का एक बड़ा रणनीतिक मिशन चला रहा है. यह अभियान मणिपुर की दुर्गम पहाड़ियों से शुरू होकर तेल अवीव की सड़कों तक जाता है. करीब 5,000 बनेई मेनाशे सदस्यों को इजराइल ले जाने की योजना का पहला चरण पिछले हफ्ते 250 लोगों के पहुंचने के साथ शुरू हुआ. यह समुदाय खुद को प्राचीन 'मनस्से' कबीले का वंशज मानता है और इस युद्धग्रस्त क्षेत्र को अपनी मंजिल मानता है.
बनेई मेनाशे समुदाय मुख्य रूप से मणिपुर और मिजोरम की कुकी, चिन और मिजो जनजातियों का एक हिस्सा है. इनका धार्मिक विश्वास है कि वे 2,700 साल पहले निर्वासित किए गए इजराइल के 'मनस्से' कबीले के सीधे वंशज हैं. शोधकर्ता आसफ रेंथलेई बताते हैं कि हिब्रू में 'बनेई' का अर्थ 'बच्चे' और 'मेनाशे' का अर्थ 'पोता' होता है. ये लोग सदियों से यहूदी परंपराओं का पालन कर रहे हैं और अब अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए काफी उत्साहित हैं.
मणिपुर में भड़की भीषण जातीय हिंसा ने इस अल्पसंख्यक समुदाय के सुरक्षित जीवन को संकट में डाल दिया है. दंगों के दौरान उनके प्रार्थना स्थल जला दिए गए और करीब 20 प्रतिशत आबादी विस्थापित हो गई है. आर्थिक रूप से भारत में मजदूरी कर ये लोग सालाना महज 1,200 डॉलर कमाते हैं, जबकि इजराइल के निर्माण क्षेत्र में यह कमाई 55,000 डॉलर तक हो सकती है. डेनियल हैंगशिंग का कहना है कि भारत उनकी जन्मभूमि है, लेकिन इजराइल ही उनका एकमात्र वादा किया गया पवित्र देश है.
इजराइल वर्तमान में युद्ध के कारण मजदूरों की गंभीर कमी का सामना कर रहा है. थाईलैंड और नेपाल के प्रवासी मजदूरों के लौटने से वहां की अर्थव्यवस्था पर काफी दबाव बढ़ा है. इमिग्रेशन मंत्री ओफिर सोफर के मुताबिक, बनेई मेनाशे का आगमन इस कमी को पूरा करने में बहुत मददगार होगा. सरकार की योजना 2030 तक सभी सदस्यों को वापस लाने की है. प्रधानमंत्री नेतन्याहू इस पुनर्वास को एक रणनीतिक फैसला मानते हैं, जो इजराइल की सुरक्षा और वहां की जनसंख्या को संतुलित करेगा.
हाल ही में पहुंचे 250 सदस्यों को उत्तरी इजराइल के नोफ हागालिल के केंद्रों में बसाया जा रहा है. यह वही इलाका है जहां हाल ही में हिज्बुल्लाह ने खतरनाक मिसाइलें दागी थीं. अतीत में इस समुदाय को हेब्रोन और गाजा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी बसाया गया था. इजराइल सरकार उनके आवास और शिक्षा पर 90 मिलियन शेकेल खर्च कर रही है. हालांकि यह क्षेत्र जोखिम भरा है, लेकिन समुदाय के लोग इसे अपनी प्राचीन सभ्यता की सुरक्षित वापसी के रूप में देख रहे हैं.
इजराइल में बसना काफी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि वहां इस समुदाय को अक्सर नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ता है. उनके एशियाई चेहरे के कारण उन्हें अक्सर 'चाइनीज' या 'कोरोना' कहकर अपमानित किया जाता है. इसके अलावा, भारत के पिछड़े इलाकों से निकलकर इजराइल के हाई-टेक माहौल में खुद को ढालना मुश्किल है. नागरिकता के लिए उन्हें औपचारिक धर्म परिवर्तन भी करना होगा. बावजूद इसके, लोग उत्साहित हैं और हिब्रू सीखने के लिए डुओलिंगो ऐप का सहारा ले रहे हैं.