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सावन में क्यों नहीं खाया जाता नॉन वेज? धर्म ही नहीं आयुर्वेद ने भी कहा है बड़ा NO, जानें अहम वजह

सावन का महीना सनातन परंपरा में पवित्र माना जाता है, जिसमें भगवान शिव की पूजा और कांवड़ यात्रा जैसी गतिविधियां होती हैं. इस दौरान मांसाहार से परहेज की पुरानी परंपरा है. सवाल यह है कि क्या यह केवल धार्मिक कारणों से है, या इसके पीछे आयुर्वेदिक और वैज्ञानिक तर्क भी हैं?

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Edited By: Princy Sharma
सावन में क्यों नहीं खाया जाता नॉन वेज? धर्म ही नहीं आयुर्वेद ने भी कहा है बड़ा NO, जानें अहम वजह
Courtesy: Pinterest

Sawan 2025: सावन का महीना सनातन परंपरा में बहुत पवित्र माना जाता है. इसे व्रत और अनुष्ठान के लिए खास माना गया है, और इस दौरान भगवान शिव की पूजा, कांवड़ यात्रा जैसी धार्मिक गतिविधियां होती हैं. इसके साथ ही, इस महीने मांसाहार से परहेज करने की पुरानी परंपरा भी चली आ रही है. हालांकि, यह सवाल उठता है कि क्या केवल धार्मिक कारणों से ही मांसाहार को वर्जित किया जाता है या फिर इसके पीछे आयुर्वेदिक और वैज्ञानिक कारण भी हैं?

धार्मिक मान्यता के अनुसार, सावन का महीना विशेष रूप से भगवान शिव की पूजा का समय होता है और इस दौरान इंद्रियों पर काबू पाने के लिए मांसाहार से बचने की सलाह दी जाती है. मांसाहार को तामसिक भोजन माना जाता है, जो शरीर और मन में आलस्य, क्रोध और अहंकार जैसी नकारात्मक भावनाओं को बढ़ाता है, जिससे अध्यात्म से दूरी बढ़ सकती है. यही कारण है कि इस समय मांसाहार को वर्जित किया जाता है.

हालांकि, आयुर्वेद में इसे और भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाया गया है.आयुर्वेदिक एक्सपर्ट के अनुसार, वर्षा ऋतु में शरीर की पाचन शक्ति (अग्नि) बहुत कमजोर हो जाती है. इस मौसम में शरीर के अंदर वात और कफ बढ़ने की स्थिति होती है, जो मांसाहार के सेवन से और बढ़ जाते हैं. मांस, विशेष रूप से बकरा, मुर्गा, और मछली, इन दिनों शरीर के लिए भारी, चिकनाई वाला और स्राव बढ़ाने वाला होता है, जिससे पाचन में दिक्कतें आ सकती हैं.

वर्षा ऋतु में मांसाहार से क्या समस्याएं हो सकती हैं?

आयुर्वेद में कहा गया है कि वर्षा ऋतु में अगर हम भारी और चिकनाई से भरे खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं, तो ये शरीर में आम (toxins) और रुकावटें पैदा कर सकते हैं. उदाहरण के तौर पर, बकरे का मांस, जो बलवर्धक होता है, वर्षा के मौसम में पचने में कठिनाई पैदा कर सकता है, जिससे अपच, जोड़ों का दर्द और सूजन जैसी समस्याएं हो सकती हैं. इसी तरह, मुर्गे का मांस भी चिकनाई और कफ बढ़ाने की प्रवृत्ति रखता है, जो वर्षा ऋतु में शरीर में जलन, त्वचा पर चिपचिपाहट और कब्ज जैसी समस्याएं उत्पन्न कर सकता है.

भादों में भी नहीं करना चाहिए सेवन

हालांकि सावन के बाद भादों में भी वर्षा का मौसम जारी रहता है, इसलिए मांसाहार का सेवन केवल सावन तक सीमित नहीं रहना चाहिए. अगर भादों में भी बारिश होती है, तो मांसाहार शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है, क्योंकि उस समय भी पाचन क्षमता कमजोर होती है. इसके अलावा, मांस का सूप एक वैकल्पिक उपाय हो सकता है. सूप में मांस के गुण तो होते हैं, लेकिन वह जल्दी पच जाता है और यह स्वास्थ्य के लिए कम हानिकारक होता है.