कभी 6 रुपये देकर फुटपाथ पर सोए, पिता ने कर्ज लेकर पढ़ाया; ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के नाम से क्यों चिढ़ते हैं 54 साल के डायरेक्टर?

अनुराग कश्यप आज बॉलीवुड के चर्चित फिल्ममेकर हैं, लेकिन यहां तक पहुंचने का उनका सफर बेहद संघर्षपूर्ण रहा है. कभी पिता ने कर्ज लेकर उन्हें पढ़ाया तो मुंबई में उन्होंने फुटपाथ और जुहू बीच पर रातें गुजारीं.

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Babli Rautela

मुंबई: अनुराग कश्यप आज हिंदी सिनेमा के उन फिल्मकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने अपनी अलग तरह की कहानियों और फिल्मों से एक खास पहचान बनाई है. निर्देशक होने के अलावा वह लेखक, निर्माता और एक्टर के तौर पर भी काम कर चुके हैं. गैंग्स ऑफ वासेपुर, देव डी और ब्लैक फ्राइडे जैसी फिल्मों ने उन्हें अलग पहचान दिलाई. लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने के पीछे उनकी जिंदगी में संघर्ष का लंबा दौर रहा है.

आज अनुराग कश्यप अपना 54वां जन्मदिन मना रहे हैं. इस खास मौके पर जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़े उन किस्सों के बारे में, जिनसे उनकी मेहनत और फिल्मी जुनून का अंदाजा लगाया जा सकता है.

पिता ने उधार लेकर भेजा था बोर्डिंग स्कूल

अनुराग कश्यप के पिता चाहते थे कि उनका बेटा अच्छी शिक्षा हासिल करे और जिंदगी में आगे बढ़े. बताया जाता है कि उन्होंने इसके लिए कर्ज लेकर अनुराग को ग्वालियर के एक महंगे बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाया. अनुराग कई मौकों पर अपने पिता के इस फैसले का जिक्र कर चुके हैं. उनका मानना रहा है कि अगर पिता ने उन्हें उस स्कूल में नहीं भेजा होता तो शायद उनकी जिंदगी की दिशा कुछ और होती.


वैज्ञानिक बनना चाहते थे अनुराग कश्यप

करियर की शुरुआत में अनुराग कश्यप का सपना फिल्ममेकर बनने का नहीं बल्कि वैज्ञानिक बनने का था. लेकिन कॉलेज के दिनों में एक फिल्म फेस्टिवल में इटालियन क्लासिक बाइसिकल थीव्स देखने के बाद सिनेमा के प्रति उनका नजरिया बदल गया. फिल्म ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने फिल्म निर्माण को ही अपना भविष्य बनाने का फैसला कर लिया.

मुंबई में पैसे खत्म हुए तो फुटपाथ पर सोए

साल 1993 में अनुराग कश्यप करीब पांच हजार रुपये लेकर मुंबई पहुंचे थे. लेकिन कुछ समय बाद उनके पैसे खत्म हो गए और रहने की समस्या खड़ी हो गई. उनके मुताबिक संघर्ष के उस दौर में उन्होंने कई रातें मुंबई की सड़कों पर गुजारीं. कभी जुहू बीच पर सोना पड़ा तो कभी कॉलेज के छात्रों के हॉस्टल में छिपकर रहना पड़ा. यहां तक कि कुछ मौकों पर महज 6 रुपये देकर फुटपाथ पर सोने की नौबत भी आई.

मुंबई में संघर्ष के दौरान अनुराग कश्यप पृथ्वी थिएटर से भी जुड़े. काम सीखने और मौके तलाशने के लिए उन्होंने वहां छोटे-मोटे काम करने से भी परहेज नहीं किया. वह थिएटर में सफाई तक करते थे और साथ ही स्क्रिप्ट लिखने का काम जारी रखते थे. उन्होंने शुरुआती दौर में कुछ टीवी प्रोजेक्ट्स के लिए बिना फीस लिए भी लेखन किया. लिखने की उनकी रफ्तार ऐसी थी कि वह एक दिन में कई पन्ने तैयार कर लेते थे.

मनोज बाजपेयी की सिफारिश से मिला बड़ा मौका

कई साल के संघर्ष के बाद 1998 में उनकी किस्मत ने करवट ली. एक्टर मनोज बाजपेयी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उनका नाम निर्देशक राम गोपाल वर्मा तक पहुंचाया. इसके बाद अनुराग कश्यप को फिल्म सत्या के लेखन से जुड़ने का मौका मिला. फिल्म को दर्शकों और समीक्षकों से जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली और अनुराग की पहचान एक प्रतिभाशाली लेखक के तौर पर मजबूत हुई.

हालांकि, इसके बाद भी उनकी मुश्किलें पूरी तरह खत्म नहीं हुईं. उनके लिखे काम को कई जगह उचित क्रेडिट नहीं मिला. असफलताओं और निराशा के दौर में वह खुद को एक कमरे तक सीमित कर चुके थे. इसी दौरान शराब की आदत भी लगने की बात सामने आई.