हिंदी भाषा की पहली किताब कौन-सी थी? World Hindi दिवस पर छात्रों को जरुर जानना चाहिए

हिंदी भाषा की पहली पुस्तक के रूप में पृथ्वीराज रासो को मान्यता दी जाती है. यह ग्रंथ 12वीं शताब्दी के शासक पृथ्वीराज चौहान के जीवन और युद्धों पर आधारित है.

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Reepu Kumari

नई दिल्ली: हिंदी भाषा के इतिहास में यह प्रश्न अक्सर उठता है कि हिंदी की पहली पुस्तक कौन सी मानी जाती है. साहित्य के विद्यार्थी और पाठक इस विषय को लेकर हमेशा जिज्ञासु रहते हैं.

इतिहासकारों और साहित्यकारों के अनुसार, पृथ्वीराज रासो को हिंदी की पहली पुस्तक का दर्जा दिया गया है. यह ग्रंथ न केवल भाषा के विकास को दर्शाता है, बल्कि उस दौर की सांस्कृतिक और वीर परंपरा की झलक भी देता है.

पृथ्वीराज रासो का साहित्यिक महत्व

पृथ्वीराज रासो को हिंदी साहित्य का प्रारंभिक महाकाव्य माना जाता है. यह रचना उस समय की भाषा और काव्य शैली को सामने लाती है, जब हिंदी अपने आरंभिक रूप में विकसित हो रही थी. साहित्य इतिहास में इसे वीरगाथा काल की प्रमुख कृति के रूप में देखा जाता है, जिसने आगे चलकर हिंदी काव्य परंपरा की दिशा तय की.

ब्रजभाषा में रचित महाकाव्य

यह ग्रंथ ब्रजभाषा में लिखा गया है, जिसे हिंदी की प्रारंभिक बोलियों में से एक माना जाता है. ब्रजभाषा उस समय उत्तर भारत में प्रचलित थी और साहित्य सृजन का प्रमुख माध्यम थी. पृथ्वीराज रासो की भाषा सरल, ओजपूर्ण और वीर रस से भरपूर मानी जाती है, जो इसे ऐतिहासिक दृष्टि से खास बनाती है.

पृथ्वीराज चौहान के जीवन पर आधारित कथा

पृथ्वीराज रासो 12वीं शताब्दी के महान योद्धा और शासक पृथ्वीराज चौहान के जीवन पर केंद्रित है. इसमें उनके पराक्रम, युद्ध कौशल और शासन से जुड़ी कथाओं का वर्णन मिलता है. ग्रंथ में राजपूत वीरता और उस समय की सामाजिक व्यवस्था की झलक भी देखने को मिलती है, जो इसे ऐतिहासिक दस्तावेज जैसा महत्व देती है.

चंद बरदाई को रचना का श्रेय

इस महाकाव्य की रचना का श्रेय चंद बरदाई को दिया जाता है, जिन्हें पृथ्वीराज चौहान का दरबारी कवि माना जाता है. माना जाता है कि चंद बरदाई ने अपने राजा के जीवन को काव्य रूप में प्रस्तुत कर उसे अमर बना दिया. हालांकि इसके विभिन्न संस्करण मिलते हैं, फिर भी साहित्य इतिहास में चंद बरदाई का नाम प्रमुख रूप से स्वीकार किया गया है.

हिंदी साहित्य में स्थान और मान्यता

पृथ्वीराज रासो को हिंदी भाषा की पहली पुस्तक मानने के पीछे इसका ऐतिहासिक और साहित्यिक महत्व है. यह ग्रंथ हिंदी के प्रारंभिक स्वरूप, काव्य परंपरा और वीरगाथा शैली को समझने का आधार प्रदान करता है. इसी वजह से इसे हिंदी साहित्य के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है.