क्या था साइमन कमीशन? जिसके विरोध में सीने पर लाठियां खाकर भी नहीं झुके लाला लाजपत राय; आज इनकी जयंती पर जाने वीरता की कहानी
साइमन कमीशन के विरोध में लाला लाजपत राय ने 63 वर्ष की उम्र में नेतृत्व किया और अंग्रेजों की लाठियां झेलीं. उनकी शहादत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे प्रेरणादायक घटनाओं में गिनी जाती है.
नई दिल्ली: भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में साइमन कमीशन का विरोध एक बड़ा मोड़ माना जाता है. इसी आंदोलन में 63 वर्ष की उम्र में लाला लाजपत राय ने अंग्रेजी हुकूमत के सामने सीना तान कर नेतृत्व किया था. इनका जन्म 28 जनवरी यानी आज ही के दिन 1865 को पंजाब में हुआ था. वे एक क्रांतिकारी राजनेता, लेखक और प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे. इन्हें 'पंजाब केसरी' भी कहा जाता है.
1927 में जब ब्रिटिश सरकार ने साइमन कमीशन का गठन किया, तब पूरे देश में इसका तीखा विरोध हुआ. साइमन कमीशन का उद्देश्य भारत सरकार अधिनियम 1919 के कामकाज की समीक्षा करना था. इस आयोग में सात सदस्य थे और सभी अंग्रेज थे.
साइमन कमीशन के विरोध की क्या है वजह?
इसमें किसी भी भारतीय को इसमें शामिल नहीं किया गया था. यही कारण था कि भारतीयों ने इसे अपमानजनक माना.भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1927 में ही इसके बहिष्कार का प्रस्ताव पारित किया. जहां जहां साइमन कमीशन गया, वहां काले झंडे दिखाए गए. साइमन वापस जाओ के नारे गूंजने लगे.
सरकार ने विरोध को दबाने के लिए कई जगह धारा 144 लागू कर दी. लाला लाजपत राय ने इस अन्याय के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन का नेतृत्व किया. उन्होंने अहिंसक तरीके से जनता को एकजुट किया. 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के खिलाफ बड़ा जुलूस निकाला गया.
किसने किया जुलूस का नेतृत्व?
इस जुलूस का नेतृत्व लाला लाजपत राय कर रहे थे. प्रदर्शन बढ़ता देख पुलिस अधीक्षक जेम्स ए स्कॉट ने लाठीचार्ज का आदेश दे दिया. अंग्रेजी पुलिस ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर बेरहमी से लाठियां बरसाईं. लाला लाजपत राय के सीने और सिर पर गंभीर चोटें आईं. इसके बावजूद लाला लाजपत राय ने पीछे हटने से इनकार कर दिया.
कब हुआ इसका निधन?
उनका कहना था कि उनके शरीर पर पड़ा हर वार अंग्रेजी साम्राज्यवाद की कब्र में कील है. इस लाठीचार्ज के बाद उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई. 17 नवंबर 1928 को चोटों के कारण उनका निधन हो गया.
उनकी शहादत ने पूरे देश को झकझोर दिया. लाला लाजपत राय का जीवन शिक्षा, समाज सुधार और देश की आजादी के लिए समर्पित था. आज भी उनकी कुर्बानी युवाओं को साहस और बलिदान की प्रेरणा देती है.