दिल्ली में प्राइवेट स्कूलों की मौज, बढ़ा सकेंगे फीस; हाईकोर्ट के फैसले ने बढ़ाई लाखों अभिभावकों की चिंता

निजी स्कूलों की फीस बढ़ोतरी को लेकर हाईकोर्ट के फैसले ने नई बहस छेड़ दी है. अदालत ने शिक्षा विभाग के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें स्कूलों को फीस बढ़ाने से पहले मंजूरी लेने की बात कही गई थी.

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Reepu Kumari

नई दिल्ली: प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती फीस से परेशान अभिभावकों के बीच अब एक नया कानूनी फैसला चर्चा का विषय बन गया है. हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें स्कूलों को फीस बढ़ाने से पहले विभागीय मंजूरी लेने की आवश्यकता बताई गई थी. कोर्ट ने इस प्रक्रिया को गलत सोच पर आधारित बताते हुए आदेश को कानूनन कमजोर माना है.

कोर्ट के इस फैसले के बाद अब गैर-सहायता प्राप्त मान्यता प्राप्त स्कूलों को बड़ी राहत मिली है. वहीं दूसरी तरफ, लाखों अभिभावकों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि क्या आने वाले समय में स्कूल फीस पर नियंत्रण और मुश्किल हो जाएगा. फैसले के बाद शिक्षा व्यवस्था को लेकर नई बहस शुरू हो गई है.

अदलात ने क्या कहा?

दिल्ली हाई कोर्ट के अनुसार, निजी और गैर-सरकारी स्कूल सत्र की शुरुआत में सरकारी अनुमति के बिना फीस बढ़ा सकते हैं. पीठ ने कहा कि शैक्षणिक सत्र के प्रारंभ में शुल्क बढ़ाने वाले स्कूलों को सत्र शुरू होने से पहले शिक्षा विभाग को प्रस्तावित शुल्क का विवरण प्रस्तुत करना होगा.

दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार को फैसला सुनाया कि निजी गैर-सहायता प्राप्त मान्यता प्राप्त स्कूलों को शैक्षणिक सत्र के प्रारंभ में शुल्क वृद्धि करने के लिए शिक्षा निदेशालय (DOI) से पूर्व अनुमति या स्वीकृति प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसा कदम केवल तभी आवश्यक है जब वे चल रहे शैक्षणिक सत्र के दौरान शुल्क वृद्धि लागू करना चाहते हैं.

नया नियम कब से लागू? 

हालांकि, निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाते हुए, न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी की पीठ ने निर्देश दिया कि शिक्षा विभाग को प्रस्तुत विवरणों में संबंधित विद्यालयों द्वारा प्रस्तावित शुल्क वृद्धि केवल 2027 के शैक्षणिक सत्र से प्रभावी होगी. पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी भी विद्यालय को पिछले शैक्षणिक सत्रों के लिए पूर्वव्यापी रूप से शुल्क या अन्य शुल्कों की मांग करने या वसूली करने की अनुमति नहीं होगी.

व्यापक हस्तक्षेप की अनुमति नहीं

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि निजी गैर-सरकारी मान्यता प्राप्त स्कूलों में शुल्क निर्धारण पर शिक्षा विभाग की नियामक शक्तियां सीमित हैं और व्यापक हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देती हैं. कोर्ट  ने कहा कि किसी स्कूल के खातों में अधिशेष धनराशि की मौजूदगी मात्र से शिक्षा विभाग यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकता कि स्कूल व्यवसायीकरण में लिप्त है.

इन धाराओं के तहत फैसला

कोर्ट ने कहा 'दिल्ली विद्यालय शिक्षा अधिनियम, 1973 की धारा 17(3) के तहत, किसी निजी, गैर-सहायता प्राप्त, मान्यता प्राप्त विद्यालय को शैक्षणिक सत्र के प्रारंभ में शुल्क बढ़ाने के लिए किसी पूर्व अनुमति या स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है; और विद्यालय पर एकमात्र वैधानिक दायित्व यह है कि उसे शैक्षणिक सत्र के प्रारंभ से पहले शिक्षा विभाग के पास प्रस्तावित शुल्क का विवरण दाखिल करना होगा'.

अदालत ने अपने 120-पृष्ठ के फैसले में कहा '...दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम, 1973 की धारा 17(3) के तहत, हालांकि, एक निजी, गैर-सहायता प्राप्त, मान्यता प्राप्त स्कूल को शिक्षा विभाग की पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता होती है यदि स्कूल चल रहे शैक्षणिक सत्र के दौरान शुल्क वृद्धि को लागू करने का प्रस्ताव करता है,'.

अदालत ने टीएमए पाई फाउंडेशन, इस्लामिक अकादमी, मॉडर्न स्कूल और पीए इनामदार के मामलों में सर्वोच्च कोर्ट  के पूर्व निर्णयों का हवाला दिया.

अगर स्कूलों ने की मनमानी तो क्या होगा?

अपने फैसले में, अदालत ने आगे कहा कि यदि कोई विद्यालय चल रहे शैक्षणिक सत्र के दौरान शुल्क वृद्धि का प्रस्ताव करता है, तो उसे संशोधित शुल्क लागू होने की तिथि से कम से कम दो महीने पहले शिक्षा विभाग को अपना प्रस्ताव प्रस्तुत करना होगा. अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि शिक्षा विभाग को ऐसे प्रस्ताव पर उसी दो महीने की अवधि के भीतर निर्णय लेना होगा, अन्यथा प्रस्ताव को स्वीकृत मान लिया जाएगा.

क्या था मामला? 

कोर्ट  ने 137 निजी, गैर-सहायता प्राप्त, मान्यता प्राप्त विद्यालयों द्वारा शिक्षा विभाग द्वारा वर्ष 2016-2017 से 2022-23 के शैक्षणिक वर्षों के लिए समय-समय पर शुल्क वृद्धि के उनके प्रस्तावों को अस्वीकार करने के खिलाफ दायर याचिका पर फैसला सुनाया.

स्कूलों ने तर्क दिया कि निजी गैर-सहायता प्राप्त मान्यता प्राप्त संस्थानों के रूप में, वे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत पर्याप्त स्वायत्तता के साथ कार्य करने के हकदार हैं, जिसमें उनकी शुल्क संरचना निर्धारित करने की स्वतंत्रता भी शामिल है.

उन्होंने तर्क दिया कि डीएसई अधिनियम के तहत शिक्षा विभाग की शक्तियां मुनाफाखोरी और व्यवसायीकरण को रोकने तक ही सीमित हैं.

फीस बढ़ाने से पहले अनुमति लेना जरुरी 

शिक्षा विभाग (DOE) की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा और दिल्ली सरकार के स्थायी वकील समीर वशिष्ठ ने तर्क दिया कि कानून के अनुसार, स्कूलों को किसी भी समय अपनी फीस बढ़ाने से पहले अनुमति लेनी आवश्यक है.

अंततः, अदालत ने शिक्षा विभाग के अस्वीकृति आदेश को रद्द कर दिया, यह मानते हुए कि निर्णय एक 'गलत सोच वाली प्रक्रिया" से उत्पन्न हुए थे और इसलिए दोषपूर्ण और कानून में अस्थिर थे.'