UPI अभी फ्री है तो इसे चलाने का कौन है उठाता खर्च? जानिए पूरा सच

हाल ही में फीस लगाने की चर्चा के बीच सरकार ने साफ कर दिया है कि बैंक अकाउंट से होने वाले यूपीआई ट्रांजैक्शन पर ग्राहकों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा. आम यूजर्स को राहत मिलने के बावजूद सवाल उठता है कि इतने बड़े सिस्टम को चलाने का खर्च कौन वहन करता है.

Pinterest
Antima Pal

भारत में डिजिटल पेमेंट का सबसे बड़ा माध्यम यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस यानी यूपीआई आज आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. दोस्त को पैसे भेजना हो या दुकान पर सामान खरीदना हो, यूपीआई से भुगतान आसान और फिलहाल मुफ्त है. 

UPI का कौन है उठाता खर्च?

हाल ही में फीस लगाने की चर्चा के बीच सरकार ने साफ कर दिया है कि बैंक अकाउंट से होने वाले यूपीआई ट्रांजैक्शन पर ग्राहकों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा. आम यूजर्स को राहत मिलने के बावजूद सवाल उठता है कि इतने बड़े सिस्टम को चलाने का खर्च कौन वहन करता है.

समझें आसान भाषा में

सरकार ने स्पष्ट किया है कि आम यूपीआई यूजर्स पर कोई चार्ज लगाने का फैसला नहीं हुआ है. बैंक अकाउंट से परिवार या दोस्तों को पैसे भेजने या दुकान पर भुगतान करने पर ग्राहक से अलग से कोई फीस नहीं ली जाएगी. बहस मुख्य रूप से मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर पर केंद्रित है. यह वह शुल्क है जो डिजिटल पेमेंट के इस्तेमाल पर आमतौर पर व्यापारी से लिया जा सकता है. बैंक अकाउंट आधारित यूपीआई मर्चेंट ट्रांजैक्शन लंबे समय से जीरो-एमडीआर मॉडल पर चल रहे हैं, यानी ज्यादातर मामलों में मर्चेंट से भी यह शुल्क नहीं लिया जाता.


संसद में हालिया कानूनी बदलाव ने सरकार को भविष्य में कुछ डिजिटल पेमेंट पर शुल्क या छूट तय करने की गुंजाइश दी है. लेकिन यह सिर्फ प्रावधान है. इसका मतलब यह नहीं कि तुरंत यूपीआई पर कोई नई फीस लागू हो गई है. असल मुद्दा यह है कि रोजाना अरबों ट्रांजैक्शन वाले इस इंफ्रास्ट्रक्चर और संचालन की लागत कैसे पूरी की जाए.

यूपीआई की हिस्सेदारी अब करीब 85 प्रतिशत

यूपीआई की शुरुआत अप्रैल 2016 में नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने की थी. शुरू में सिर्फ 21 बैंक जुड़े थे और पहले महीने केवल 373 ट्रांजैक्शन हुए थे. आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है. मई 2026 में करीब 23.20 बिलियन यानी 2,320 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए, जिनकी कुल वैल्यू लगभग 29.90 लाख करोड़ रुपये रही. वित्त वर्ष 2025-26 में यूपीआई ने लगभग 24,162 करोड़ ट्रांजैक्शन प्रोसेस किए, जिनकी वैल्यू 314 लाख करोड़ रुपये से अधिक थी. देश के कुल डिजिटल पेमेंट वॉल्यूम में यूपीआई की हिस्सेदारी अब करीब 85 प्रतिशत हो गई है.

8,276 करोड़ रुपये का बजटीय आवंटन

जीरो-एमडीआर मॉडल के कारण ज्यादातर बैंक अकाउंट आधारित मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर शुल्क नहीं लगता. सरकार ने इस मॉडल को बनाए रखने के लिए बजट से समर्थन दिया है. वित्तीय सेवा विभाग के अनुसार इसके लिए 8,276 करोड़ रुपये का बजटीय आवंटन किया गया. अर्थशास्त्री अजीत रानाडे ने इसे महत्वपूर्ण सब्सिडी बताया है, जिसने यूपीआई को अंतिम यूजर के लिए मुफ्त रखने में मदद की. आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा भी पहले कह चुके हैं कि यूपीआई के संचालन की लागत कोई न कोई चुका ही रहा है.

वर्तमान में सरकार और संबंधित संस्थाओं का फोकस आम लोगों को मुफ्त सुविधा देते हुए सिस्टम को टिकाऊ बनाना है. बड़े मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर भविष्य में कुछ व्यवस्था हो सकती है, लेकिन आम यूजर्स के लिए फिलहाल यूपीआई मुफ्त रहेगा. यह मॉडल डिजिटल इंडिया को मजबूत बना रहा है, लेकिन लंबे समय में लागत का सवाल महत्वपूर्ण बना रहेगा.