मुनाफा हो या घाटा, शेयर बाजार में देना ही पड़ेगा ये Tax! जानिए STT के पूरे नियम
शेयर बाजार में मुनाफा हो या नुकसान, सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स यानी STT देना जरूरी है. इक्विटी, इंट्राडे, डिलीवरी, फ्यूचर्स और ऑप्शंस में इसकी दरें अलग-अलग हैं और ब्रोकर इसे स्वतः काटता है.
मुंबई: शेयर बाजार में ट्रेडिंग करने वालों के लिए केवल शेयर की कीमत और मुनाफे पर नजर रखना काफी नहीं है. हर सौदे के साथ कुछ टैक्स और शुल्क भी जुड़े होते हैं. इनमें सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स यानी STT अहम है. खास बात यह है कि ट्रेड में नुकसान होने पर भी STT देना पड़ता है.
शेयर बाजार में हर सौदे पर लागू
शेयर बाजार में खरीद-बिक्री के दौरान सरकार STT वसूलती है. इसे निवेशक को अलग से जमा नहीं करना पड़ता, बल्कि ब्रोकर ट्रेड पूरा होते ही निर्धारित रकम काट लेता है. इसका हिसाब आमतौर पर कॉन्ट्रैक्ट नोट में दिया जाता है. इक्विटी डिलीवरी में खरीद और बिक्री दोनों पर 0.1 प्रतिशत STT लगता है. वहीं इंट्राडे कारोबार में केवल बिक्री पर 0.025 प्रतिशत टैक्स लागू होता है. यानी यह टैक्स आपके वास्तविक मुनाफे के बजाय लेन-देन की रकम के आधार पर तय होता है.
Futures और Options में अलग नियम
Futures कारोबार में STT केवल बिक्री के समय लगता है और इसकी दर 0.05 प्रतिशत है. Options में बिक्री के समय मिले प्रीमियम पर 0.15 प्रतिशत STT लगाया जाता है. उदाहरण के लिए, अगर किसी विकल्प का कुल प्रीमियम 3,000 रुपये है, तो 0.15 प्रतिशत की दर से STT 4.50 रुपये बनेगा, जिसे राउंडिंग के बाद 5 रुपये माना जाएगा. Option exercise होने की स्थिति में भी STT लागू होता है और इसकी गणना intrinsic value के आधार पर की जाती है. इसलिए F&O ट्रेडर्स के लिए इन नियमों को समझना खासा जरूरी है.
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मुनाफा नहीं, कारोबार की रकम मायने रखती है
STT की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह आपके ट्रेड के फायदे या नुकसान के हिसाब से तय नहीं होता. मान लीजिए किसी ट्रेडर ने दिनभर में कारोबार करके 10 हजार रुपये गंवा दिए, तब भी संबंधित लेन-देन पर लागू STT देना होगा. इसी तरह हाई-वॉल्यूम ट्रेडिंग करने वालों के लिए छोटी प्रतिशत दर भी बड़ी रकम बन सकती है. डिलीवरी में खरीद और बिक्री दोनों पर टैक्स लगने के कारण कुल लागत बढ़ जाती है. इसलिए ट्रेडिंग रणनीति बनाते समय STT को नजरअंदाज करना नुकसानदेह हो सकता है.
ट्रेडिंग से पहले लागत का हिसाब जरूरी
12 अगस्त 2026 के मौजूदा नियमों के मुताबिक निवेशकों को अलग-अलग सेगमेंट की STT दरों को समझकर ही अपनी ट्रेडिंग लागत का अनुमान लगाना चाहिए. इक्विटी डिलीवरी, इंट्राडे, Futures और Options में टैक्स की गणना अलग तरीके से होती है. ब्रोकर इसे अपने स्तर पर काटकर सरकार के पास जमा करता है, इसलिए निवेशक को अलग से भुगतान नहीं करना पड़ता. हालांकि कॉन्ट्रैक्ट नोट में इसकी जांच करना जरूरी है. खासकर लगातार या बड़े मूल्य के सौदे करने वालों के लिए STT कुल ट्रेडिंग लागत और अंतिम रिटर्न पर असर डाल सकता है.