RBI MPC Meeting: रेपो रेट स्थिर, महंगाई बढ़ी और GDP ग्रोथ घटी! जानिए अर्थव्यवस्था के 5 बड़े संकेत?

आरबीआई ने रेपो रेट को 5.25% पर बरकरार रखा है जिससे लोन ईएमआई स्थिर रहेगी. हालांकि कमजोर मानसून और बढ़ती ऊर्जा कीमतों के कारण FY27 के लिए जीडीपी ग्रोथ का अनुमान घटाकर 6.6% किया गया है.

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Kuldeep Sharma

नई दिल्ली: लोन की ईएमआई का बोझ बढ़ेगा या मिलेगी राहत? क्या देश में बढ़ने वाली है महंगाई? इन तमाम सवालों के जवाब देने के लिए देश के केंद्रीय बैंक यानी भारतीय रिजर्व बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी यानी MPC की अहम बैठक हाल ही में संपन्न हुई है. हर बार की तरह इस बार भी इस बैठक पर पूरे देश के व्यापारियों, नौकरीपेशा लोगों और अर्थशास्त्रियों की नजरें टिकी हुई थीं.

आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इस बैठक में लिए गए फैसलों का एलान करते हुए बताया कि बैंक ने अपनी प्रमुख ब्याज दर यानी 'रेपो रेट' को 5.25% पर जस का तस रखने का फैसला किया है. इसके साथ ही बैंक ने अपना नीतिगत रुख 'न्यूट्रल' या तटस्थ बनाए रखा है जिसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में आर्थिक हालातों को देखते हुए ब्याज दरों को घटाया या बढ़ाया जा सकता है.

रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं

आम जनता के लिए इस पूरी बैठक का सबसे बड़ा और सीधा असर उनकी जेब पर पड़ता है. रेपो रेट वह दर होती है जिस पर आरबीआई देश के अन्य कमर्शियल बैंकों को कर्ज देता है. चूंकि इस बार रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखा गया है इसलिए बैंकों पर अपनी ब्याज दरें बढ़ाने का कोई तात्कालिक दबाव नहीं होगा. इसका सीधा फायदा आम उपभोक्ताओं को मिलेगा. अगर आपने कोई होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन ले रखा है, तो उसकी ईएमआई फिलहाल बढ़ने की आशंका नहीं है. वह स्थिर बनी रहेगी. इस फैसले पर मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी (MPC) के सभी सदस्यों ने सर्वसम्मति से अपनी मुहर लगाई है. 

आर्थिक विकास यानी GDP अनुमान

आरबीआई ने देश की आर्थिक विकास दर यानी रियल जीडीपी ग्रोथ को लेकर अपने पुराने अनुमानों में थोड़ा बदलाव किया है. वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान पहले 6.9% लगाया गया था जिसे अब घटाकर 6.6% कर दिया गया है. केंद्रीय बैंक का मानना है कि आने वाले समय में देश की अर्थव्यवस्था पहले के अनुमानों के मुकाबले थोड़ी धीमी रफ्तार से आगे बढ़ेगी. इस सुस्ती के पीछे आरबीआई ने कुछ मुख्य वजहों का भी जिक्र किया है.

ऊर्जा की बढ़ती कीमतें- वैश्विक स्तर पर एनर्जी और कच्चे तेल की कीमतों में आ रहे उछाल से लागत बढ़ सकती है. 

कमजोर मानसून की स्थिति- देश के कुछ हिस्सों में मानसून के कमजोर रहने की आशंका है जिससे कृषि क्षेत्र और ग्रामीण मांग प्रभावित हो सकती है. 

महंगाई को लेकर बढ़ी चिंता

एक तरफ जहां जीडीपी ग्रोथ का अनुमान घटाया गया है वहीं दूसरी तरफ महंगाई को लेकर आरबीआई के सुर थोड़े आक्रामक हुए हैं. केंद्रीय बैंक ने भविष्य में कीमतें बढ़ने की आशंका जताई है और अपने पुराने अनुमानों को संशोधित किया है.

समयावधि (Period)

अनुमान में इस बढ़ोतरी का मतलब है कि आने वाले दिनों में बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें उम्मीद से थोड़ी ज्यादा बढ़ सकती हैं. हालांकि संतोष की बात यह है कि पिछले कुछ सालों में देखी गई अत्यधिक महंगाई के मुकाबले यह अब भी काफी हद तक नियंत्रण में रहने की उम्मीद है. 

विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये की स्थिति 

देश की वित्तीय स्थिरता के मोर्चे पर एक बहुत अच्छी खबर सामने आई है. आरबीआई ने बताया कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बेहद मजबूत स्थिति में है और यह लगभग 68.23 बिलियन डॉलर के स्तर पर पहुंच चुका है. यह फंड इतना पर्याप्त है कि इससे देश के करीब 11 महीनों के इम्पोर्ट का खर्च आसानी से निकाला जा सकता है जो किसी भी बाहरी आर्थिक संकट से देश को बचाने के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच है. 

इसके अलावा विदेशी मुद्रा बाजार को सहारा देने के लिए आरबीआई ने चार महीने के लिए एक विशेष रियायती फॉरेक्स स्वैप सुविधा शुरू करने का एलान किया है. भारतीय रुपये के मूल्य को लेकर केंद्रीय बैंक ने साफ किया है कि रुपये की कीमत का कोई निश्चित टारगेट तय नहीं किया गया है. इसे पूरी तरह से बाजार के उतार-चढ़ाव और स्थितियों के आधार पर आगे बढ़ने दिया जाएगा. 

निवेशकों और प्रवासियों के लिए बड़ी घोषणाएं- अर्थव्यवस्था में विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए इस बैठक में कुछ और महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं.

विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs)- सरकारी बॉन्ड से होने वाले पूंजीगत लाभ पर मिलने वाली टैक्स राहत को और बढ़ा दिया गया है, जिससे विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों की तरफ आकर्षित होंगे. 

NRI और OCI निवेश- गैर-आवासीय भारतीयों यानी कि NRI और ओवरसीज सिटिजंस ऑफ इंडिया के लिए निवेश की सीमाओं को बढ़ा दिया गया है ताकि देश में विदेशी पूंजी का प्रवाह तेज हो सके. 

कुल मिलाकर देखा जाए तो रिजर्व बैंक की यह नई नीति एक बेहद संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण पेश करती है. एक तरफ जहां केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों को स्थिर रखकर देश की आर्थिक तरक्की और आम जनता को सहारा दिया है तो वहीं दूसरी तरफ महंगाई के खतरों और वैश्विक अनिश्चितताओं को देखते हुए अपने कदम फूंक-फूंक कर रखे हैं ताकि देश में वित्तीय स्थिरता बनी रहे.