Nifty 23,800 के नीचे! अब 23,600 तक जाएगी गिरावट या यहीं से पलटेगा बाजार? जानें एक्सपर्ट्स का सपोर्ट लेवल
निफ्टी के 23,800 के नीचे फिसलने से बाजार में और गिरावट की आशंका बढ़ी है. विश्लेषकों के मुताबिक 23,600-23,800 अगला अहम सपोर्ट क्षेत्र है, जबकि 24,150 के ऊपर मजबूती जरूरी होगी.
भारतीय शेयर बाजार पर बुधवार को वैश्विक घटनाक्रम का सीधा असर दिखा. अमेरिका-ईरान संघर्ष बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतें चढ़ीं और महंगाई को लेकर चिंता गहरी हुई. इसके साथ अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ने से निवेशकों पर दबाव आया और निफ्टी अहम स्तरों के नीचे चला गया.
23,800 के नीचे फिसला निफ्टी
दोपहर 12:12 बजे सेंसेक्स 609.74 अंक गिरकर 76,334.54 पर कारोबार कर रहा था. निफ्टी भी 222.05 अंक टूटकर 23,833.75 पर आ गया. हालांकि कारोबार के दौरान निफ्टी 23,800 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे भी चला गया. बाजार में 1,313 शेयर बढ़त में थे, जबकि 2,486 शेयरों में गिरावट दर्ज हुई. इस व्यापक बिकवाली से संकेत मिला कि दबाव केवल कुछ चुनिंदा शेयरों तक सीमित नहीं है.
23,600-23,800 पर अगला बड़ा सहारा
बाजार की अगली दिशा को लेकर निवेशकों की नजर अब 23,600 से 23,800 के क्षेत्र पर है. बजाज ब्रोकिंग के मुताबिक यह इलाका पिछले बड़े गैप और जुलाई 2026 के निचले स्तर से जुड़ा हुआ है, इसलिए यहां बाजार को तकनीकी सहारा मिल सकता है. हालांकि शॉर्ट टर्म में तेजी की वापसी के लिए निफ्टी को पिछले दो हफ्तों के करीब 24,380 के उच्च स्तर के ऊपर टिकना जरूरी होगा.
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23,950 टूटा तो बढ़ सकती है गिरावट
Axis Direct के रिसर्च प्रमुख राजेश पालविया के अनुसार 24,150 के नीचे निफ्टी फिलहाल कमजोर नजर आ रहा है. अगर 23,950 का स्तर निर्णायक रूप से टूटता है तो सूचकांक 23,800 की ओर और दबाव में आ सकता है. इसके विपरीत 24,150-24,200 के ऊपर लगातार कारोबार होने पर बिकवाली का दबाव कम हो सकता है. आने वाले दिनों में कच्चे तेल और मध्य-पूर्व की स्थिति बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगी.
कच्चा तेल और अमेरिकी यील्ड बनी चिंता
ब्रेंट क्रूड करीब 1% चढ़कर 95.4 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचा, जबकि कारोबार के दौरान यह लगभग छह सप्ताह के उच्च स्तर तक गया. दूसरी ओर अमेरिकी 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड 4.788% के 20 महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गई. Geojit Investments के वीके विजयकुमार ने चेताया कि अगर यह यील्ड 5% तक पहुंचती है तो वैश्विक इक्विटी बाजार में बड़ी गिरावट का जोखिम बढ़ सकता है. बढ़ती ऊर्जा लागत और ऊंची ब्याज दरें भारतीय शेयरों के लिए भी चुनौती बन सकती हैं.