मिडिल क्लास लोग क्यों नहीं खरीद पा रहे अपने सपनों का घर? बिल्डर्स कर रहे ये बड़ा गेम!
भारत में तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच किफायती घरों की कमी चिंता का विषय बनती जा रही है. डेवलपर्स लग्जरी प्रोजेक्ट्स पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, जबकि मध्यम और कम आय वर्ग के लोगों के लिए घर खरीदना मुश्किल होता जा रहा है.
भारत का रियल एस्टेट बाजार एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां महंगे और प्रीमियम घरों की चमक के बीच किफायती आवास का संकट गहराता दिख रहा है. तेजी से बढ़ती शहरी आबादी और बदलती जीवनशैली के कारण घरों की मांग लगातार बढ़ रही है. हालांकि, डेवलपर्स का झुकाव अधिक मुनाफे वाले लग्जरी प्रोजेक्ट्स की ओर बढ़ने से मध्यम और कम आय वर्ग के लोगों के लिए अपने बजट में घर खरीदना पहले की तुलना में अधिक कठिन होता जा रहा है.
लग्जरी प्रोजेक्ट्स की ओर बढ़ता रुझान
पिछले कुछ वर्षों में देश के बड़े शहरों में प्रीमियम और लग्जरी हाउसिंग प्रोजेक्ट्स की संख्या तेजी से बढ़ी है. कोविड-19 महामारी के बाद लोगों की पसंद में बदलाव आया और बड़े घरों, खुली जगहों तथा आधुनिक सुविधाओं वाले प्रोजेक्ट्स की मांग बढ़ गई. इस मांग ने डेवलपर्स को भी आकर्षित किया क्योंकि ऐसे प्रोजेक्ट्स में बेहतर मुनाफा मिलता है. उच्च आय वर्ग की बढ़ती क्रय क्षमता और निवेश की बढ़ती रुचि ने भी इस ट्रेंड को मजबूती दी है. नतीजतन, बाजार में महंगे फ्लैट और हाई-एंड टाउनशिप तेजी से विकसित हो रही हैं, जबकि किफायती आवास की हिस्सेदारी लगातार घटती दिखाई दे रही है.
मिडिल क्लास के लिए बढ़ती चुनौतियां
किफायती घरों की राह में कई बाधाएं खड़ी हैं. जमीन की बढ़ती कीमतें, निर्माण लागत में इजाफा और सीमित लाभ मार्जिन के कारण डेवलपर्स इस सेगमेंट में निवेश से बच रहे हैं. आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और निम्न आय समूह के लिए बनाए जाने वाले प्रोजेक्ट्स को पर्याप्त गति नहीं मिल पा रही है. इसके अलावा, कई शहरों में भूमि उपलब्ध होने के बावजूद कानूनी विवाद, बुनियादी सुविधाओं की कमी और खराब कनेक्टिविटी जैसी समस्याएं परियोजनाओं को प्रभावित कर रही हैं. इससे घरों की आपूर्ति मांग के मुकाबले काफी पीछे रह गई है.
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नियम और वित्तीय बाधाएं
रिपोर्ट में बताया गया है कि FAR और FSI जैसे नियमों की जटिलता, मंजूरी की लंबी प्रक्रिया और कम लागत वाले वित्त की कमी भी बड़ी समस्या है. किफायती आवास क्षेत्र में काम करने वाली वित्तीय संस्थाओं को बैंकों की तुलना में अधिक लागत पर पूंजी जुटानी पड़ती है. वहीं टियर-2 और टियर-3 शहरों में घरों की मांग बढ़ने के बावजूद आसान ऋण सुविधाओं की उपलब्धता सीमित बनी हुई है. इन कारणों से डेवलपर्स के लिए कम कीमत वाले घर बनाना आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो गया है, जिसका सीधा असर आम खरीदारों पर पड़ रहा है.
समाधान की दिशा में क्या जरूरी है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किफायती आवास को प्राथमिकता नहीं दी गई तो भविष्य में आवासीय असमानता और बढ़ सकती है. रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि मास्टर प्लान में EWS और LIG श्रेणी के लिए अलग भूमि आरक्षित की जाए, मंजूर FAR बढ़ाया जाए और निर्माण संबंधी नियमों में कुछ लचीलापन लाया जाए. साथ ही सिंगल-विंडो मंजूरी प्रणाली, सस्ती फंडिंग, लंबी अवधि के होम लोन और कर रियायतों जैसी सुविधाएं भी जरूरी हैं. तेजी से बढ़ते शहरों के बीच यह सुनिश्चित करना सबसे बड़ी चुनौती होगी कि हर आय वर्ग के लोगों को अपनी क्षमता के अनुरूप घर मिल सके.