एक ही दिन में सप्तमी से विसर्जन तक, बंगाल के इस गांव की दुर्गा पूजा की परंपरा जानकर रह जाएंगे हैरान
पश्चिम बंगाल के आसनसोल के धेनुआ गांव स्थित कालीकृष्ण आश्रम में महालया के दिन ही सप्तमी, अष्टमी, नवमी और विसर्जन समेत दुर्गा पूजा के प्रमुख अनुष्ठान पूरे किए जाते हैं.
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा का त्योहार अपनी भव्यता और अनोखी परंपराओं के लिए जाना जाता है. यहां कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जहां सदियों पुरानी मान्यताओं के अनुसार मां दुर्गा की पूजा की जाती है. आसनसोल के हीरापुर इलाके के धेनुआ गांव में भी दुर्गा पूजा की एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जो इसे दूसरे पूजा स्थलों से अलग बनाती है.
दामोदर नदी के किनारे स्थित कालीकृष्ण आश्रम में महालया के दिन ही सप्तमी, अष्टमी, नवमी और विसर्जन समेत सभी प्रमुख अनुष्ठान पूरे कर लिए जाते हैं. यहां मां दुर्गा के साथ गणेश, कार्तिक, लक्ष्मी और सरस्वती के बजाय उनकी सखियों जया और विजया की पूजा की जाती है.
1937 में हुई थी आश्रम की स्थापना
धेनुआ गांव में होने वाली इस विशेष आगमनी दुर्गा पूजा की परंपरा संत तेजानंद ब्रह्मचारी से जुड़ी बताई जाती है. स्थानीय मान्यता के अनुसार, वर्ष 1937 में दामोदर नदी के किनारे कालीकृष्ण आश्रम की स्थापना हुई थी. इसके बाद वर्ष 1979 से यहां विशेष आगमनी दुर्गा पूजा की परंपरा को व्यापक रूप से आगे बढ़ाया गया. तब से यह आयोजन स्थानीय लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है.
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मां दुर्गा के साथ विराजती हैं जया और विजया
इस पूजा की सबसे खास बात यहां स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमा है. आमतौर पर बंगाल की दुर्गा पूजा में मां के साथ भगवान गणेश, कार्तिकेय, देवी लक्ष्मी और सरस्वती की प्रतिमाएं दिखाई देती हैं. हालांकि, धेनुआ गांव की इस प्रतिमा में यह परंपरा देखने को नहीं मिलती. यहां मां दुर्गा के साथ उनकी दो सखियां जया और विजया तथा सिंह का स्वरूप मौजूद रहता है.
स्थानीय मान्यता और पौराणिक कथा के अनुसार, जब मृत्युलोक में बीमारियों और असुरों का आतंक बढ़ गया था, तब मां दुर्गा स्वर्ग से धरती पर आई थीं. मां की रक्षा के लिए उनकी सखियों जया और विजया ने भी उनके साथ आने का संकल्प लिया था. इसी मान्यता के आधार पर यहां मां दुर्गा के साथ जया और विजया की पूजा की जाती है.
एक ही दिन में पूरे होते हैं सभी प्रमुख अनुष्ठान
पूजा से जुड़े नारायण दत्त के मुताबिक, यह आयोजन साल में केवल एक बार होता है और श्रद्धालु पूरे साल इसका इंतजार करते हैं. महालया के दिन ही सप्तमी, अष्टमी और नवमी से जुड़े अनुष्ठान पूरे किए जाते हैं. इसी दिन विसर्जन की प्रक्रिया भी संपन्न होती है. श्रद्धालु इस परंपरा को मां दुर्गा के विशेष आशीर्वाद से जोड़कर देखते हैं.
परिमल भंडारी के अनुसार, इस पूजा को लेकर लोगों में पूरे साल उत्साह बना रहता है. महालया के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु कालीकृष्ण आश्रम पहुंचते हैं. पूजा संपन्न होने के बाद से ही लोगों को अगले साल के आयोजन का इंतजार रहने लगता है.
बंगाल के साथ झारखंड से भी पहुंचते हैं श्रद्धालु
दामोदर नदी के किनारे पुराने शिव मंदिर के पास होने वाला यह आयोजन स्थानीय आस्था और धार्मिक परंपरा का अनोखा संगम है. महालया के दिन पितृपक्ष की समाप्ति और देवी पक्ष की शुरुआत के साथ मां दुर्गा के आगमन का उत्सव मनाया जाता है. इस दौरान पूरा इलाका भक्तिमय माहौल में डूब जाता है.
धेनुआ गांव की इस विशेष दुर्गा पूजा में आसनसोल और दुर्गापुर के अलावा पश्चिम बर्धमान, पूर्व बर्धमान, बांकुड़ा और पुरुलिया जैसे इलाकों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं. झारखंड से भी बड़ी संख्या में लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं. महालया के दिन ही प्रमुख अनुष्ठानों को पूरा करने और मां के साथ जया-विजया की पूजा करने की अनोखी परंपरा के कारण यह आयोजन दूर-दूर तक अपनी अलग पहचान बनाए हुए है.