सभी सुविधाएं होने के बाद भी क्यों नहीं मिलता आन्तरिक सुख? गीता में छिपा है जवाब
गीता का संदेश है कि मनुष्य को अपने कर्म पर ध्यान देना चाहिए, फल की आसक्ति पर नहीं. निष्काम भाव से किया गया कर्म मन को शांति देता है और जीवन में सच्चे सुख और संतोष का मार्ग खोलता है.
नई दिल्ली: जीवन में हर व्यक्ति सफलता, धन, सम्मान और सुख की कामना करता है. अक्सर लोग मानते हैं कि सभी इच्छाएं पूरी हो जाएं तो जीवन पूरी तरह खुशहाल हो जाएगा. लेकिन कई बार ऐसा नहीं होता. सब कुछ मिलने के बाद भी मन खाली और बेचैन महसूस करता है. इसका उत्तर श्रीमद्भगवद्गीता के कर्मयोग सिद्धांत में मिलता है.
गीता के अनुसार मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल पर नहीं. इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य लक्ष्य बनाना छोड़ दे, बल्कि यह है कि वह अपने कर्म पूरी निष्ठा और ईमानदारी से करे लेकिन परिणाम के प्रति अत्यधिक आसक्ति न रखे. जब व्यक्ति केवल फल की चिंता करता है, तब उसका मन चिंता, भय और तनाव से भर जाता है. इसके विपरीत जब वह अपना कर्तव्य निष्काम भाव से निभाता है, तब उसे मानसिक शांति और संतोष मिलता है.
क्या है पौराणिक कथा?
इस सिद्धांत को एक पौराणिक कथा के माध्यम से भी समझाया जाता है. कथा के अनुसार जब माता लक्ष्मी का स्वयंवर आयोजित हुआ, तब देवता और दानव सभी उन्हें पाने की इच्छा लेकर पहुंचे. माता लक्ष्मी ने घोषणा की कि वह उसी को अपना वर चुनेंगी जिसे उनकी इच्छा न हो. सभी आश्चर्यचकित रह गए, क्योंकि वहां उपस्थित हर व्यक्ति उन्हें पाने की कामना कर रहा था.
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इसी दौरान माता लक्ष्मी की दृष्टि भगवान विष्णु पर पड़ी. भगवान विष्णु क्षीरसागर में शांत और स्थिर भाव से विराजमान थे. उन्हें न स्वयंवर की चिंता थी और न ही लक्ष्मी को पाने की इच्छा. उनके भीतर किसी प्रकार का लोभ या लालसा नहीं थी. माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु के गले में वरमाला डाल दी और तभी से वह उनके साथ विराजमान हैं.
मराठी संत परंपरा में भी एक प्रसिद्ध उक्ति कही जाती है, न मागे तयाची रमा होय दासी. इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति धन और लक्ष्मी के पीछे नहीं भागता, उसके पास लक्ष्मी स्वयं आ जाती हैं. यह संदेश केवल धन के बारे में नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र पर लागू होता है.
गीता से क्या मिलती है सिख?
गीता का निष्काम कर्म का सिद्धांत सिखाता है कि सफलता का सबसे अच्छा मार्ग अपने कर्तव्य को पूरी लगन से निभाना है. जब व्यक्ति परिणाम की चिंता छोड़कर ईमानदारी से प्रयास करता है, तब उसका काम बेहतर होता है और सफलता भी अधिक संतोष देती है.
यही कारण है कि केवल इच्छाओं की पूर्ति से स्थायी सुख नहीं मिलता. सच्चा सुख मन की शांति, संतोष और निष्काम कर्म में छिपा होता है. जब व्यक्ति अपनी अपेक्षाओं और आसक्ति पर नियंत्रण कर लेता है, तब जीवन में मिलने वाली हर सफलता का आनंद भी कई गुना बढ़ जाता है.