होलिका दहन 2026: ये 5 लोग क्यों नहीं देखते आग की लपटें? नई दुल्हन से लेकर गर्भवती तक, होली से पहले जानिए क्यों
इस साल होलिका दहन 3 मार्च की शाम को होगा और 4 मार्च को रंग वाली होली मनाई जाएगी. हिंदू परंपरा में होलिका दहन की अग्नि देखना कुछ लोगों के लिए अशुभ माना जाता है.
नई दिल्ली: होली का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, लेकिन इसके पीछे कई पुरानी परंपराएं और मान्यताएं छिपी हैं. फाल्गुन पूर्णिमा पर होलिका दहन होता है, जहां लोग लकड़ियों की चिता जलाकर बुराई का अंत करते हैं. फिर अगले दिन रंगों से होली खेली जाती है. इस साल 3 मार्च को होलिका दहन और 4 मार्च को धुलेंडी मनाई जाएगी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस अग्नि को देखने से कुछ लोग खुद को दूर रखते हैं?
मान्यताएं सदियों पुरानी
ये मान्यताएं सदियों पुरानी हैं, जो परिवार की खुशियां और स्वास्थ्य की रक्षा करती हैं. आज हम इन्हीं पांच खास लोगों के बारे में बात करेंगे, जो होलिका दहन की लपटें नहीं देखते.
नई दुल्हन: ससुराल से मायके की ओर
शादी के बाद नई बहू को होलिका दहन से पहले ही मायके भेज दिया जाता है. वह कभी ससुराल में इस अग्नि का दर्शन नहीं करती. पौराणिक कथा के मुताबिक, होलिका का विवाह इलोजी से तय था, लेकिन हिरण्यकश्यप के कहने पर वह प्रह्लाद के साथ अग्नि में बैठ गई और भस्म हो गई. बारात पहुंची तो इलोजी की मां ने चिता देखकर दुख से प्राण त्याग दिए. इसी वजह से नई दुल्हन को इस दुखद घटना की याद से बचाया जाता है, ताकि वैवाहिक जीवन में कोई कलह न आए.
सास-बहू का साथ: रिश्तों में खटास से बचाव
सास और बहू को एक साथ खड़े होकर होलिका दहन नहीं देखना चाहिए. मान्यता है कि ऐसा करने से घर में मतभेद बढ़ते हैं और रिश्ते बिगड़ सकते हैं. होलिका की कहानी में भी परिवारिक कलह का जिक्र है, इसलिए इस परंपरा से सास-बहू के बीच तनाव कम रखने की कोशिश की जाती है. कई परिवारों में यह नियम सख्ती से निभाया जाता है, ताकि त्योहार की खुशियां बनी रहें और घर में अमन-चैन कायम रहे.
इकलौती संतान की मां: प्रह्लाद की याद में सावधानी
जिन माताओं की सिर्फ एक ही संतान है, उन्हें होलिका दहन देखने से मना किया जाता है. प्रह्लाद हिरण्यकश्यप की इकलौती संतान थे, जिन्हें होलिका अग्नि में ले गई थी. इस कथा से जुड़कर यह मान्यता बनी कि इकलौती संतान वाली मां को इस अग्नि से दूर रहना चाहिए, ताकि उनके बच्चे पर कोई विपत्ति न आए. यह परंपरा मां के मन में सुरक्षा की भावना जगाती है.
गर्भवती महिलाएं: स्वास्थ्य और सुरक्षा पहले
गर्भवती महिलाओं को होलिका दहन की अग्नि देखने या परिक्रमा करने से रोका जाता है. धुआं, तेज गर्मी और भीड़ उनके लिए हानिकारक हो सकती है. पौराणिक रूप से भी यह अशुभ माना जाता है. डॉक्टर भी सलाह देते हैं कि गर्भावस्था में ऐसी जगहों से दूर रहें, जहां धुआं या प्रदूषण ज्यादा हो. इस नियम से मां और बच्चे दोनों की सेहत सुरक्षित रहती है.
नवजात शिशु: नकारात्मक ऊर्जा से बचाव
छोटे नवजात बच्चों को होलिका दहन की जगह से पूरी तरह दूर रखा जाता है. मान्यता है कि चौराहों पर जलने वाली चिता के आसपास नकारात्मक ऊर्जा ज्यादा रहती है, जो बच्चे के लिए ठीक नहीं. स्वास्थ्य की दृष्टि से भी धुआं और ठंड बच्चों के लिए खतरनाक हो सकता है. इसलिए परिवार वाले बच्चे को घर में ही रखते हैं और त्योहार की खुशियां सुरक्षित तरीके से मनाते हैं.
Disclaimer: यहां दी गई सभी जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. theindiadaily.com इन मान्यताओं और जानकारियों की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह ले लें.
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