Ahoi Ashtami Vrat Katha: अहोई अष्टमी पर क्यों रखते हैं व्रत, कौन हैं अहोई माता? यहां जानें पूरी कहानी
अहोई माता को मां पार्वती का रूप माना जाता है. वे संतानों की रक्षक देवी हैं. उनका प्रतीक अक्सर साही के रूप में दिखाया जाता है, जो मातृत्व और क्षमा का प्रतीक है. निःसंतान महिलाएं भी यह व्रत रखकर संतान सुख की प्रार्थना करती हैं.
Ahoi Ashtami 2026: अहोई अष्टमी 2026 इस साल 1 नवंबर, रविवार को मनाई जाएगी. यह दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर आता है. करवा चौथ के लगभग चार दिन बाद और दीपावली से पहले यह व्रत मनाया जाता है. उत्तर भारत में यह पर्व माताओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है.
अहोई अष्टमी पर क्यों रखते हैं व्रत
इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखमय जीवन के लिए व्रत रखती हैं. सुबह सूर्योदय से पहले व्रत शुरू होता है. कई महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं, यानी पानी भी नहीं पीतीं. शाम को अहोई माता की पूजा की जाती है. दीवार पर अहोई माता का चित्र या साही (नेवला) का रूप बनाकर पूजन होता है. तारों के दर्शन के बाद अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है. चंद्रमा देर रात उगता है, इसलिए ज्यादातर तारों को देखकर ही पारण करते हैं.
कौन हैं अहोई माता?
अहोई माता को मां पार्वती का रूप माना जाता है. वे संतानों की रक्षक देवी हैं. उनका प्रतीक अक्सर साही के रूप में दिखाया जाता है, जो मातृत्व और क्षमा का प्रतीक है. निःसंतान महिलाएं भी यह व्रत रखकर संतान सुख की प्रार्थना करती हैं. मान्यता है कि अहोई माता की कृपा से बच्चों पर आने वाले संकट दूर होते हैं और परिवार में खुशहाली आती है.
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व्रत की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार एक महिला जंगल में मिट्टी खोद रही थी. गलती से साही के बच्चों की मौत हो गई. इससे वह बहुत दुखी हुई. उसने देवी से क्षमा मांगी और सच्ची भक्ति से प्रार्थना की. देवी प्रसन्न हुईं और वरदान दिया कि उसकी संतान सदैव सुरक्षित रहेगी. तभी से माताएं हर साल अहोई अष्टमी पर यह व्रत रखती हैं. वे अपनी संतानों की कुशलता, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करती हैं.
यह व्रत सिर्फ उपवास नहीं, बल्कि मातृत्व के प्रेम और विश्वास का प्रतीक है. पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा हिंदू परिवारों में आज भी जीवित है. अहोई माता की आराधना से संतान का जीवन मंगलमय बनता है.