सावधान ! कल से शुरू हो रहा है 'अग्नि पंचक', भूलकर भी न करें ये 5 काम; वरना उठाना पड़ सकता है भारी नुकसान
फरवरी 2026 में मंगलवार से शुरू होने वाला 'अग्नि पंचक' विशेष रूप से निर्माण और शुभ कार्यों के लिए वर्जित है. इस दौरान दक्षिण दिशा की यात्रा और लकड़ी के कार्यों से बचना चाहिए. हालांकि पूजा-पाठ से इसके नकारात्मक प्रभाव कम किए जा सकते हैं.
नई दिल्ली: हिंदू धर्म और ज्योतिष शास्त्र में समय की गणना का विशेष महत्व है. जिसमें 'पंचक' की अवधि को विधिक रूप से अशुभ माना गया है. फरवरी 2026 में मंगलवार से प्रारंभ होने वाला पंचक 'अग्नि पंचक' के रूप में आ रहा है. ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार. पंचक का प्रभाव सप्ताह के दिनों और नक्षत्रों के संयोग पर निर्भर करता है. यह काल न केवल मांगलिक कार्यों के लिए वर्जित है. बल्कि इस दौरान किए गए कुछ विशिष्ट कार्य भविष्य में भारी नुकसान या बाधाओं का कारण बन सकते हैं.
फरवरी महीने का यह पंचक 17 फरवरी 2026, मंगलवार को प्रातः 09:05 बजे से प्रारंभ होगा और 21 फरवरी 2026, शनिवार की शाम 07:07 बजे समाप्त होगा. चूंकि इसकी शुरुआत मंगलवार को हो रही है. इसलिए ज्योतिष शास्त्र में इसे 'अग्नि पंचक' कहा गया है. शास्त्रों के अनुसार. शनिवार से शुरू होनेवाले पंचक को 'मृत्यु पंचक' कहा जाता है. जो सबसे अधिक घातक होता है. जबकि अग्नि पंचक के दौरान आग से जुड़े कार्यों और मशीनरी के उपयोग में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए.
पंचक के दौरान वर्जित विधिक कार्य
पंचक काल में लकड़ी से संबंधित कोई भी कार्य करना अत्यंत अशुभ माना जाता है. इस अवधि में लकड़ी का फर्नीचर. जैसे पलंग या चारपाई बनवाना पूरी तरह टाल देना चाहिए. इसके अतिरिक्त. घर की छत बनवाना या किसी भी नए निर्माण कार्य की आधारशिला रखना शुभ फल नहीं देता. मांगलिक आयोजन जैसे विवाह. गृह प्रवेश या अन्य महत्वपूर्ण अनुष्ठान इस समय वर्जित हैं. इन नियमों का उल्लंघन करने पर व्यक्ति को आर्थिक और मानसिक प्रभार झेलना पड़ सकता है.
पांच नक्षत्रों का अशुभ प्रभाव और सावधानी
पंचक का निर्माण पांच विशेष नक्षत्रों - धनिष्ठा. शतभिषा. उत्तरा भाद्रपद. पूर्वा भाद्रपद और रेवती के मेल से होता है. धनिष्ठा को इस श्रेणी का पहला और रेवती को अंतिम नक्षत्र माना जाता है. इन नक्षत्रों के प्रभाव के कारण ही इस समय को किसी भी नए संकल्प या शुभ कार्य के लिए अनुपयुक्त माना गया है. इस दौरान किसी भी संदिग्ध गतिविधि से बचना चाहिए क्योंकि इन नक्षत्रों में किया गया कार्य अक्सर अधूरा या दोषपूर्ण रह जाता है.
दक्षिण दिशा की यात्रा और यम का वास
धार्मिक मान्यताओं में दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना गया है. पंचक काल के दौरान इस दिशा में यात्रा करना विधिक रूप से वर्जित है. क्योंकि इसे कष्टकारी माना जाता है. ज्योतिषियों का मानना है कि इस समय दक्षिण दिशा की ओर जाने से दुर्घटना या अन्य विपित्तियों का खतरा बढ़ जाता है. यात्रा का यह ढांचा यम के प्रभाव में होने के कारण व्यक्ति को असुरक्षा का अनुभव करा सकता है. इसलिए अनिवार्य परिस्थितियों को छोड़कर इस दिशा में गमन नहीं करना चाहिए.
नकारात्मक प्रभाव कम करने के अचूक उपाय
पंचक के नकारात्मक प्रभावों से बचने के लिए भगवान शिव और विष्णु की नियमित पूजा एक सुरक्षा कवच का कार्य करती है. यदि दक्षिण दिशा की यात्रा अनिवार्य हो. तो पहले हनुमान चालीसा का पाठ करें और उत्तर दिशा की ओर कुछ कदम चलकर यात्रा प्रारंभ करें. तुलसी पूजन और दान-पुण्य करना भी इस दौरान सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है. इन धार्मिक उपायों को अपनाकर व्यक्ति पंचक के प्रतिकूल प्रभाव को कम करने का निर्णय ले सकता है. जो आत्मिक शांति प्रदान करता है.