BJP के 'पितामह' की धरती पर पहली बार खिला 'कमल', मोदी-शाह ने कैसे साकार किया श्यामा प्रसाद का सपना?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भाजपा ने 190 से अधिक सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की है. यह जीत न केवल राजनीतिक बदलाव का संकेत है, बल्कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी के वैचारिक सपनों की पूर्ति भी मानी जा रही है.
नई दिल्ली: बंगाल की धरती को वैचारिक क्रांति की भूमि कहा जाता है. रवीन्द्रनाथ टैगोर से लेकर सुभाष चंद्र बोष जैसी शख्शियत का जन्म इसी धरती पर हुआ. अब उसी धरती पर पहली बार बीजेपी ने विजय पताका लहरा दी है और टीएमसी को करारी हार मिली है. राजनीति के जानकार भले ही इस जीत को महज एक बड़ी राजनीतिक सफलता के रूप में देख रहे हो, लेकिन हकीकत यह है कि बीजेपी के लिए यह जीत इस सबसे बढ़कर है. आज उस राजनेता की जन्मभूमि पर भगवा लहराया है, जिसे बीजेपी का पितामह कहा जाता है और बीजेपी ने बंगाल जीतकर एक तरह से उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी है.
जी हां, हम बात कर रहे हैं श्यामा प्रसाद मुखर्जी की, जिसके विचारों से ही बीजेपी प्रेरित है. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म पस्चिम बंगाल में ही हुआ था, लिहाजा बगाल की जीत बीजेपी की लिए कई मायनों में बेहद शानदार है. अपने स्थापना के बाद से बीजेपी बंगाल के रण को भेद पाने में कामयाब नहीं हो प् आ रही थी, लेकिन मोदी-शाह के नेतृत्व में जिस तरह से बीजेपी का स्वर्णिम काल चल रहा है, उस दौर में बीजेपी ने बंगाल का भी किला फतह कर लिया है और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपने को साकार किया है.
भाजपा इस जीत को अपने संस्थापक विचारकों के प्रति ‘पितृऋण’ चुकाने के रूप में देख रही है. डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जिन्हें भाजपा का ‘पितामह’ कहा जाता है, उनकी जन्मभूमि पर पहली बार पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला है. यह जीत वैचारिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है. भाजपा का मानना है कि बंगाल की जनता ने ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के उस विचार को स्वीकार किया है, जिसकी नींव मुखर्जी ने रखी थी.
कौन थे श्यामा प्रसाद मुखर्जी?
श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 1901 में कोलकाता के एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उन्होंने 1929 में राजनीति में कदम रखा और कांग्रेस से जुड़े, लेकिन एक साल बाद ही अलग हो गए. 1939 में वे हिंदू महासभा में शामिल हुए और 1940 में उसके अध्यक्ष बने. स्वतंत्र भारत की पहली सरकार में वे उद्योग और आपूर्ति मंत्री रहे, लेकिन बाद में उन्होंने इस्तीफा देकर 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की. यही जनसंघ आगे चलकर भाजपा की वैचारिक नींव बना. उनका प्रसिद्ध नारा- ‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे’- आज भी भाजपा की विचारधारा का अहम हिस्सा है. कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद भाजपा के लिए बंगाल जीतना एक वैचारिक चक्र की पूर्णता जैसा माना जा रहा है.
टीएमसी का पतन और भाजपा का उभार
ममता बनर्जी की ‘मां, माटी, मानुष’ की राजनीति के मुकाबले भाजपा ने ‘सबका साथ, सबका विकास’ और ‘सभ्यता की सुरक्षा’ का नारा दिया. इस रणनीति ने राज्य के मध्यम वर्ग और ग्रामीण मतदाताओं को प्रभावित किया. भाजपा नेताओं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव प्रचार के दौरान लगातार श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपनों को पूरा करने का वादा किया. अब चुनाव परिणामों के बाद पार्टी इसे अपनी बड़ी वैचारिक जीत के रूप में पेश कर रही है.
75 साल का इंतजार खत्म
इतिहास गवाह है कि जनसंघ से लेकर भाजपा तक के लिए बंगाल की जमीन लंबे समय तक राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण रही. लेफ्ट के 34 साल और टीएमसी के 15 सालों के शासन ने भाजपा को हाशिए पर रखा. लेकिन 2026 के चुनाव ने यह तस्वीर बदल दी. पहली बार राज्य में भाजपा सरकार बनने जा रही है, जो पार्टी के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है.
मोदी-शाह ने पहले ही दे दिया था संकेत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही संकेत दे दिया था कि बंगाल में बदलाव आने वाला है. उन्होंने कहा था कि राज्य में भाजपा सरकार बनने पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपनों को पूरा किया जाएगा. वहीं अमित शाह ने भी वादा किया कि बंगाल की संस्कृति और विरासत को पुनर्जीवित किया जाएगा और घुसपैठ जैसे मुद्दों पर सख्त कदम उठाए जाएंगे.
कोलकाता के भाजपा मुख्यालय में जश्न का माहौल है, लेकिन यह सिर्फ चुनावी जीत का जश्न नहीं है. यह उस संकल्प की पूर्ति का प्रतीक है, जो 1951 में लिया गया था. भाजपा के लिए यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि उसने उस भूमि पर अपनी सत्ता स्थापित की है, जहां से उसके वैचारिक आधार की शुरुआत हुई थी.