बिहार में मकर संक्रांति पर खिचड़ी के बजाए क्यों खाते हैं दही-चुड़ा?


Shanu Sharma
15 Jan 2026

जीवन का सहारा

    भारत की प्राचीन धान-आधारित सभ्यता में दही-चूड़ा केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि जीवन का सहारा रहा है.

समृद्धि का प्रतीक

    गंगा, कोसी, सोन जैसी उपजाऊ नदियों की घाटियों में जहां धान को धन और समृद्धि का प्रतीक माना गया, वहीं चूड़ा ने यात्रियों और ग्रामीणों की भूख को सहेज रखा.

Bihar_(6)

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क्यों खास है चूड़ा?

    चूड़ा भूनकर, कूटकर बनाया जाने वाला यह हल्का भोजन महीनों तक सुरक्षित रहता था. धान स्थिरता का प्रतीक था और चूड़ा उस स्थिरता को संजोकर रखने का माध्यम है.

दही का विशेष स्थान

    दूसरी ओर दही पशुपालन संस्कृति की देन है. ऋग्वेद में 'दधि' को शुद्धता और सात्त्विकता का प्रतीक बताया गया. यज्ञ, व्रत और अतिथि-सत्कार में दही का विशेष स्थान रहा.

संयम और करुणा का प्रतीक

    लोककथाओं में दही-चूड़ा संयम और करुणा का प्रतीक बनता है. अकाल के समय गांव की महिलाएं घर-घर से थोड़ा-थोड़ा चूड़ा और दही इकट्ठा कर सभी को खिलाती थीं.

सस्ता और सामान्य भोजन

    यह बराबरी का भोजन है. इसमें न महंगे मसाले, न शाही ठाठ. इसे 'काजू दही-चूड़ा' या 'केसर दही-चूड़ा' नहीं बनाया जा सकता.

समरसता का प्रतीक

    बिहार में कहावत है कि मेहमान दही-चूड़ा खा ले, तो घर का हो जाता है. यह जाति-वर्ग की दीवारें गिराता है और समरसता का प्रतीक बनता है.

खेती के आदर का त्योहार

    मकर संक्रांति सूर्य की पूजा, प्रकृति के सम्मान और खेती के आदर का त्योहार है. उत्तरायण का यह पर्व नई शुरुआत का संदेश देता है. बिहार में इसे 'तिला संक्रांति' भी कहते हैं. गंगा स्नान के बाद दही-चूड़ा, गुड़ और तिलकुट का सेवन अनिवार्य है.

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