क्यों आज भी मकर संक्रांति पर काले कौवों को न्यौता देते हैं कुमाऊंनी?
Babli Rautela
15 Jan 2026
घुघुतिया त्योहार
कुमाऊं में मकर संक्रांति को घुघुतिया या उत्तरायणी के नाम से जाना जाता है. त्योहार से एक दिन पहले घरों में आटा, गुड़, घी और सूजी से विभिन्न आकृतियों वाले घुघुतिया बनाए जाते हैं
कौवों को न्योता
घुघुतिया की माला बनाकर बच्चे सुबह-सुबह कौवों को बुलाते हैं. वे चिल्लाते हैं – "काले कौवा काले घुघुती माला खा ले". कौवे आते हैं और घुघुतिया खाते हैं, जो दोस्ती और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है.
लोककथा
कुमाऊं के चंद वंश के राजा कल्याण चंद को संतान नहीं थी. बाघनाथ मंदिर में प्रार्थना के बाद उन्हें पुत्र रत्न प्राप्त हुआ, जिसका नाम निर्भयचंद रखा गया. मां उन्हें प्यार से 'घुघुती' कहती थीं.
कौवों की दोस्ती
राजा के पुत्र के जन्म से मंत्री को राजगद्दी मिलने की उम्मीद टूट गई. उसने घुघुती को मारने की योजना बनाई. एक दिन मंत्री ने घुघुती को जंगल ले जाकर छोड़ दिया. लेकिन एक कौवे ने यह देख लिया और जोर-जोर से कांव-कांव किया.
कौवों का बहादुर हमला
कौवों ने घुघुती की माला लेकर महल पहुंचकर अलार्म बजाया. एक कौवा माला लेकर उड़ा, तो राजा और सैनिक उसके पीछे गए. कौवों ने मंत्री और साथियों पर हमला कर उन्हें भगा दिया. घुघुती को जंगल में बचाया गया.
घर वापसी
राजा ने घुघुती को घर लाकर गले लगाया. मंत्री को सजा दी गई. मां ने ढेर सारे पकवान बनाए और घुघुती ने अपने मित्र कौवों को खिलाए.
आज भी जीवित परंपरा
आज भी बच्चे घुघुतिया माला पहनकर कौवों को बुलाते हैं. यह त्योहार मां-बेटे के प्यार, दोस्ती और प्रकृति से जुड़ाव की याद दिलाता है.
त्योहार की खासियत
घुघुतिया सिर्फ खाने-पीने का त्योहार नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और परिवार के मूल्यों का प्रतीक है. कौवों को भोजन देना प्रकृति के प्रति कृतज्ञता दिखाता है.