उत्तराखंड के सबसे बड़े जू सफारी प्रोजेक्ट ने पकड़ी रफ्तार, 10 साल बाद सामने आई बड़ी अपडेट

उत्तराखंड के गौलापार में प्रस्तावित जू सफारी परियोजना को करीब 10 साल बाद नई रफ्तार मिली है. निर्माण एजेंसी ब्रिडकुल ने 412 हेक्टेयर क्षेत्र का सर्वे पूरा कर 270 करोड़ रुपये की प्राथमिक परियोजना रिपोर्ट (पीपीआर) वन विभाग को सौंप दी है.

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Reepu Kumari

उत्तराखंड के गौलापार में लंबे समय से प्रस्तावित जू सफारी परियोजना अब आगे बढ़ती दिखाई दे रही है. करीब एक दशक से विभिन्न कारणों से रुकी यह महत्वाकांक्षी योजना एक बार फिर चर्चा में है. निर्माण एजेंसी ब्रिडकुल ने परियोजना के लिए जरूरी सर्वेक्षण पूरा कर वन विभाग को 270 करोड़ रुपये की प्राथमिक परियोजना रिपोर्ट सौंप दी है. वन विभाग अब इस रिपोर्ट का परीक्षण कर रहा है. परीक्षण पूरा होने के बाद इसे शासन के पास भेजा जाएगा. यदि प्राथमिक परियोजना रिपोर्ट को मंजूरी मिलती है तो अगले चरण में विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने का काम शुरू होगा. इससे परियोजना के धरातल पर उतरने की उम्मीद पहले से अधिक मजबूत मानी जा रही है.

412 हेक्टेयर क्षेत्र का सर्वे पूरा

मई 2026 में जू सफारी के निर्माण की जिम्मेदारी ब्रिडकुल को सौंपी गई थी. इसके बाद एजेंसी ने वन विभाग के साथ बैठक कर एक समिति बनाई. आधुनिक सैटेलाइट आधारित तकनीक से पूरे 412 हेक्टेयर क्षेत्र का सर्वेक्षण किया गया. सर्वे पूरा होने के बाद 270 करोड़ रुपये की प्राथमिक परियोजना रिपोर्ट वन विभाग को सौंप दी गई.

मंजूरी के बाद तैयार होगी डीपीआर

ब्रिडकुल के अधिकारियों के अनुसार, शासन से प्राथमिक परियोजना रिपोर्ट स्वीकृत होने पर कुल लागत का दो प्रतिशत यानी लगभग 5.4 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए जाएंगे. इसी राशि से विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की जाएगी. एजेंसी का लक्ष्य है कि अगस्त के अंत तक डीपीआर तैयार कर ली जाए, ताकि आगे की प्रक्रिया समय पर शुरू हो सके.


करीब 10 वर्षों से अटका हुआ है प्रोजेक्ट

गौलापार जू सफारी परियोजना का सफर वर्ष 2016 में शुरू हुआ था. उस समय अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर की आधारशिला रखी गई थी, जिसे बाद में जू सफारी परियोजना का नाम दिया गया. शुरुआती चरण में 14.52 करोड़ रुपये की लागत से लगभग 13 किलोमीटर लंबी चारदीवारी भी बनाई गई, लेकिन इसके बाद परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी.

वन मंत्रालय की आपत्तियों से रुका था काम

वर्ष 2021 में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने परियोजना पर कुछ आपत्तियां दर्ज की थीं. इसके बाद 2022 में यह शर्त रखी गई कि किसी भी वन्यजीव कॉरिडोर में बाधा नहीं आनी चाहिए. इस शर्त के साथ परियोजना को आगे बढ़ाने की मंजूरी दी गई, लेकिन अन्य प्रक्रियाओं के कारण निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पाया.

निर्माण एजेंसी बदलने के बाद बढ़ी उम्मीद

वर्ष 2024 में डीपीआर तैयार करने की जिम्मेदारी एक अन्य कंपनी को दी गई थी, लेकिन जरूरी धनराशि नहीं मिलने से काम रुक गया. इसके बाद मई 2026 में निर्माण एजेंसी बदलकर ब्रिडकुल को जिम्मेदारी सौंपी गई. तराई पूर्वी वन प्रभाग के डीएफओ हिमांशु बागरी ने बताया कि प्राथमिक परियोजना रिपोर्ट प्राप्त हो चुकी है और परीक्षण के बाद इसे शासन को भेजा जाएगा.