यूजीसी बिल पर सवर्ण समाज के विरोध पर क्या बोले बृजभूषण शरण सिंह, यहां सरल भाषा में समझें पूरा विवाद

यूजीसी के नए समानता नियम 2026 को लेकर सवर्ण समाज का विरोध तेज हो गया है. चुनावी राज्यों में राजनीतिक दबाव बढ़ा है और सरकार पर नियमों पर पुनर्विचार करने की मांग तेज होती जा रही है.

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Kanhaiya Kumar Jha

लखनऊ: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा लागू किए गए ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ ने देश की राजनीति और शिक्षा जगत में नई बहस छेड़ दी है. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सहित देश के कई अन्य राज्यों में इस नए नियम का पुरजोर विरोध हो रहा है और सवर्ण समाज इसको लेकर केंद्र सरकार पर लगातार निशाना साध रहे हैं. सवर्ण समाज से जुड़े संगठन इस नियम को 'असमानता बढ़ाने वाला नियम' बता रहे हैं. इस साल कई राज्यों में चुनाव होने हैं, लिहाजा यह मुद्दा अब केंद्र सरकार के लिए चुनौती बनता जा रहा है.

यूजीसी ने 15 जनवरी 2026 से सभी संबद्ध विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में नए समानता नियम लागू किए हैं. इसका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जातीय भेदभाव को खत्म करना बताया गया है. इस नियम के तहत एससी, एसटी के साथ-साथ ओबीसी छात्रों, शिक्षकों और शिक्षकेतर कर्मचारियों को भी भेदभाव और उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराने का अधिकार दिया गया है.

क्यों कुछ कहने से बच रहा पक्ष-विपक्ष?

वही इस नियम को लेकर सरकार के साथ ही विपक्ष भी कुछ कहने से बच रहा है. चूंकि यह मुद्दा सीधे तौर पर सवर्ण बनाम पिछड़ों का करार दिया जा रहा है, इसलिए राजनीति से जुड़े लोगों को इस पर चुप रहना ही ज्यादा मुफीद लग रहा है. राजनेताओं को डर है कि अगर इस मुद्दे पर कुछ खुलकर कहा जाए, तो किसी एक वर्ग की नाराजगी उन्हें झेलनी पड़ सकती है, जिसका रिस्क वो नहीं लेना चाहते.

बृजभूषण शरण सिंह ने क्या कहा?

वही इस मुद्दे पर जब बीजेपी के पूर्व सांसद बृजभूषण बृजभूषण शरण सिंह से सवाल किया गया, तो वो भी इसका जवाब देने से कतराते नजर आए. उन्होंने यह कहकर बात दाल दी कि उन्होंने इस नए नियम से जुड़े प्रावधानों को फिलहाल नहीं पढ़ा है, लिहाजा वो इस पर अभी कुछ कमेंट नहीं कर सकते. हालांकि उनकी चुप्पी इस बात का साफ संकेत है कि बीजेपी अभी इस मुद्दे पर कुछ भी बोलने से परहेज कर रही है और पार्टी के नेताओं को भी शायद इस बाबत हिदायत दी गई है. लेकिन अब देश के कई राज्यों में सवर्ण समाज ने इस नए नियम को लेकर मोर्चा खोल दिया है.

सवर्ण समाज क्यों नाराज?

सवर्ण समाज के संगठनों का कहना है कि यह नियम संतुलन बिगाड़ सकता है. उनका तर्क है कि अब किसी भी शिकायत के आधार पर उन्हें सफाई देनी होगी. इससे नियमों के दुरुपयोग की आशंका है. उनका मानना है कि कुलपति और प्राचार्य पहले ही सभी छात्रों की शिकायत सुनते हैं. ऐसे में नई व्यवस्था से असमानता बढ़ेगी और सवर्ण वर्ग को अलग-थलग किया जाएगा.

नए कोषांग और समितियों की व्यवस्था

नियमों के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में समान अवसर प्रकोष्ठ का गठन अनिवार्य किया गया है. इसमें एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के छात्र, शिक्षक और कर्मचारी शामिल होंगे. विश्वविद्यालय स्तर पर एक समानता समिति बनेगी, जिसमें ओबीसी, महिला और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधि भी होंगे. यह समिति हर छह महीने में रिपोर्ट बनाकर यूजीसी को भेजेगी.

राजनीतिक और चुनावी असर

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. इससे पहले युवाओं की नाराजगी का अनुभव सरकार कर चुकी है. यूपी में पुलिस भर्ती परीक्षा के पेपर लीक ने पहले ही सरकार को नुकसान पहुंचाया था. ऐसे में सवर्ण समाज की नाराजगी को नजरअंदाज करना सत्तारूढ़ दल के लिए जोखिम भरा माना जा रहा है. वरिष्ठ भाजपा नेता भी बयान देने से बचते दिख रहे हैं.