दिल्ली में ड्यूटी के दौरान हार्ट अटैक से सेना के जवान का निधन, सैन्य सम्मान के साथ नम आंखों से दी गई अंतिम विदाई
लुधियाना के गांव गगड़ा निवासी भारतीय सेना के जवान सिकंदर सिंह का दिल्ली में ड्यूटी के दौरान हार्ट अटैक से निधन हो गया. शुक्रवार को उनका पार्थिव शरीर गांव पहुंचा, जहां सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया.
भारतीय सेना के जवान नायक सिकंदर सिंह का दिल्ली में ड्यूटी के दौरान अचानक हार्ट अटैक आने से निधन हो गया. तिरंगे में लिपटे पार्थिव शरीर को देखते ही पत्नी और परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया. अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में ग्रामीण, रिश्तेदार और सेना के अधिकारी मौजूद रहे.
सिकंदर सिंह की पत्नी रमनजीत कौर ने बताया कि चार दिन पहले उनकी पति से आखिरी बार फोन पर बात हुई थी. बातचीत के दौरान उन्होंने सीने में दर्द होने की बात कही थी. परिवार वालों से यही उनकी आखिरी बातचीत थी, उनकी पत्नी का कहना है कि वह अपनी दोनों बेटियों से आखिरी समय में बात नहीं कर पाए थे. अचानक उनके निधन की खबर मिलने के बाद पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा.
शादी के बाद पत्नी की पढ़ाई भी करवाई
रमनजीत कौर ने बताया कि उनके पति हमेशा परिवार को आगे बढ़ाने की सोच रखते थे. शादी के बाद उन्होंने उन्हें एमए और बीएड तक की पढ़ाई पूरी करने के लिए प्रेरित किया और हर कदम पर साथ दिया.
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उन्होंने कहा कि उन्हें अपने पति पर गर्व है, जिन्होंने देश की सेवा करते हुए अपना जीवन समर्पित कर दिया. अब उनकी केवल यही मांग है कि सरकार उनकी दोनों बेटियों के भविष्य की जिम्मेदारी निभाने में सहयोग करे. करीब पांच वर्ष पहले सिकंदर सिंह का विवाह हुआ था. उनके परिवार में पत्नी के अलावा ढाई वर्ष और आठ महीने की दो बेटियां हैं. पिता के असमय निधन से दोनों बच्चियों के सिर से पिता का साया उठ गया. परिवार का कहना है कि सिकंदर हमेशा अपनी बेटियों की पढ़ाई और बेहतर भविष्य को लेकर चिंतित रहते थे और उनके लिए बड़े सपने देखते थे.
संघर्षों के बीच सेना तक पहुंचने का सफर
जगराओं के निकट स्थित गांव गगड़ा के रहने वाले सिकंदर सिंह करीब 16 वर्ष पहले भारतीय सेना की 5 सिख लाइट इन्फैंट्री में भर्ती हुए थे. वह एक साधारण मजदूर परिवार से ताल्लुक रखते थे. आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और कड़ी मेहनत के दम पर सेना में जगह बनाई. तीन भाइयों में सबसे बड़े होने के कारण उन्होंने कम उम्र में ही परिवार की जिम्मेदारियां संभाल ली थीं. पिता के साथ मिलकर घर का सहारा बने और अपने परिवार को बेहतर जीवन देने का लगातार प्रयास करते रहे. जनवरी में सिकंदर सिंह 45 दिन की छुट्टी पर घर आए थे और मार्च में वापस ड्यूटी पर लौट गए थे. इसके बाद वह सीधा झंडे में लिपटकर ही घर वापस लौंटे.