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हॉस्टल के खाने में मेंढक फिर आगनबाड़ी में बच्चों को परोसी गई कीड़े वाली दाल, MP में बच्चों की सेहत के साथ हो रहा खिलवाड़!

मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में हाल ही में दो चौंकाने वाली घटनाओं ने बच्चों के भोजन की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर दिए हैं. पहले कोलारस तहसील के जगतपुरा हॉस्टल में बच्चों को मरे हुए मेंढक वाली सब्जी परोसी गई, और फिर करैरा तहसील के वार्ड नंबर 4 की आंगनवाड़ी में बच्चों की दाल में कीड़े पाए गए.

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Garima Singh

Madhya Pradesh News: मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में हाल ही में दो चौंकाने वाली घटनाओं ने बच्चों के भोजन की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर दिए हैं. पहले कोलारस तहसील के जगतपुरा हॉस्टल में बच्चों को मरे हुए मेंढक वाली सब्जी परोसी गई, और फिर करैरा तहसील के वार्ड नंबर 4 की आंगनवाड़ी में बच्चों की दाल में कीड़े पाए गए. इन घटनाओं ने खाद्य आपूर्ति की लापरवाही को उजागर किया है  माता-पिता ने गुस्से में व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा, "हमारे बच्चों की ज़िंदगी से खिलवाड़ हो रहा है."

करैरा की आंगनवाड़ी में कीड़े वाली दाल परोसने की घटना ने माता-पिता को स्तब्ध कर दिया. गुस्साए अभिभावकों ने तत्काल कार्रवाई की मांग की, लेकिन भोजन आपूर्तिकर्ता मौके से भाग निकला. दूसरी ओर, जगतपुरा छात्रावास में मरे हुए मेंढक वाली सब्जी की तस्वीरें छात्रों ने स्वयं सोशल मीडिया पर साझा कीं, जिसके बाद वार्डन पर लापरवाही का आरोप लगा. महिला एवं बाल विकास विभाग के परियोजना अधिकारी एस. शेखरन ने दाल में कीड़े की बात स्वीकार की और कहा, "नोटिस जारी कर जाँच शुरू कर दी गई है." लेकिन उनका यह दावा कि अन्य आंगनवाड़ियों से शिकायत नहीं आई, कुपोषण से जूझ रहे इस जिले में खोखला लगता है.

मध्य प्रदेश में कुपोषण की भयावह स्थिति 

मध्य प्रदेश में कुपोषण की स्थिति भयावह है. राज्य में 10 लाख बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, जिनमें 1.36 लाख गंभीर रूप से कमजोर हैं. इस साल के पहले तीन महीनों में ही 5,928 बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्रों (एनआरसी) में उपचार की आवश्यकता पड़ी. राष्ट्रीय कुपोषण दर 5.40% है, लेकिन मध्य प्रदेश में यह 7.79% तक पहुंच चुकी है. इसके अलावा, 57% महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं, जो अगली पीढ़ी को जन्म से पहले ही कमजोर कर रही हैं. केंद्र के पोषण ट्रैकर ऐप ने मई 2025 तक 55 में से 45 जिलों को "रेड जोन" में चिह्नित किया है, जहां 20% से अधिक बच्चे कम वजन के हैं. 4,895 करोड़ रुपये के पोषण बजट के बावजूद, बच्चों की मौत का सिलसिला लगातार जारी है, भ्रष्टाचार और इस समस्या के समाधान में उदासीनता के कारण संकट और गहराता जा रहा है.