पाकिस्तान ने ईरान से जोड़े छह कॉरिडोर, लेकिन सबसे बड़ा सवाल-भारत के बिना यह पूरा खेल कहीं ‘डेड एंड’ तो नहीं बन जाएगा?

पाकिस्तान ने ईरान के साथ व्यापार बढ़ाने के लिए छह नए कॉरिडोर खोलने का ऐलान किया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन रास्तों की असली मंज़िल क्या होगी. भारत जैसे बड़े बाजार के बिना यह पूरा प्रोजेक्ट अधूरा और कमजोर दिखाई देता है.

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Lalit Sharma

पाकिस्तान ने ईरान के साथ अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए छह नए जमीनी रास्तों की घोषणा की है. इन कॉरिडोर का उद्देश्य क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मजबूत करना बताया जा रहा है. खास तौर पर तफ्तान को इस नेटवर्क का मुख्य गेटवे माना जा रहा है. लेकिन इस पूरे प्लान में एक बड़ी कमी साफ दिखाई देती है.

रास्ता आगे जाकर किस बड़े बाजार से जुड़ेगा, इसका जवाब स्पष्ट नहीं है. यही वजह है कि इसे एक “डेड एंड रोड” कहा जा रहा है. पाकिस्तान भले ही इस प्रोजेक्ट को बड़ी सफलता के रूप में पेश कर रहा हो, लेकिन इसके दीर्घकालिक फायदे पर सवाल उठने लगे हैं.

मार्केट के बिना बेकार नेटवर्क

किसी भी व्यापारिक कॉरिडोर की सफलता उसके अंत में मौजूद बाजार पर निर्भर करती है. पाकिस्तान और चीन मिलकर चाहे जितनी बड़ी कनेक्टिविटी बना लें, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजारों में से एक भारत इस नेटवर्क का हिस्सा नहीं है. इसका सीधा असर यह होगा कि व्यापार का प्रवाह सीमित रहेगा. यूरोप से आने वाले टूरिस्ट और कारोबारी इस रूट का पूरा उपयोग नहीं कर पाएंगे. ऐसे में यह कॉरिडोर सिर्फ एक गुजरने वाला रास्ता बनकर रह जाएगा, जो बड़े आर्थिक लाभ नहीं दे पाएगा.

इतिहास से नहीं लिया सबक

अगर इतिहास की बात करें तो “हिप्पी ट्रेल” जैसे पुराने रास्ते इसलिए सफल हुए थे क्योंकि उनका अंतिम गंतव्य भारत था. यूरोप से निकलकर यात्री और व्यापारी भारत तक आते थे, जिससे इस रूट की अहमियत बढ़ जाती थी. अब पाकिस्तान उसी तरह का नेटवर्क बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन भारत को इसमें शामिल नहीं किया गया है. यही वजह है कि यह प्रयास अधूरा नजर आता है. यह वैसा ही है जैसे कोई लंबी रेलवे लाइन बना दे, लेकिन उसका अंतिम स्टेशन ही तय न हो.

रणनीति में बड़ी चूक

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान ने इस प्रोजेक्ट में रणनीतिक गलती की है. उसने रास्ते तो बना दिए, लेकिन यह नहीं सोचा कि इन रास्तों का इस्तेमाल कौन करेगा और किस उद्देश्य से करेगा. व्यापार सिर्फ रास्तों से नहीं चलता, बल्कि बाजार और मांग से चलता है. भारत जैसे बड़े बाजार की अनुपस्थिति में यह पूरा नेटवर्क सीमित दायरे में सिमट सकता है. यही कारण है कि इस योजना की सफलता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं.

चीन की योजना भी अधर में

चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा के जरिए चीन इस पूरे नेटवर्क को जोड़ना चाहता है. चीन के लिए यह रूट ऊर्जा और व्यापार के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है. लेकिन यहां भी वही समस्या सामने आती है मांग की कमी. चीन को ऊर्जा चाहिए और पाकिस्तान को ट्रांजिट फीस, लेकिन इन दोनों के बीच एक बड़ा बाजार नहीं है जो इस सिस्टम को टिकाऊ बना सके. भारत के बिना यह पूरा मॉडल कमजोर नजर आता है.

जियोपॉलिटिक्स का असली खेल

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि भारत इस प्रोजेक्ट का हिस्सा नहीं है, फिर भी वही इसकी सफलता या असफलता तय कर रहा है. अगर भारत इस नेटवर्क में शामिल होता तो यह कॉरिडोर क्षेत्रीय व्यापार का बड़ा केंद्र बन सकता था. लेकिन भारत के बाहर रहने से इसकी उपयोगिता सीमित हो गई है. इस तरह भारत एक “साइलेंट गेम चेंजर” के रूप में उभरकर सामने आया है.

आर्थिक फायदे पर सवाल

पाकिस्तान इस कॉरिडोर से बड़े आर्थिक फायदे की उम्मीद कर रहा है. उसे लगता है कि इससे ट्रांजिट फीस, व्यापार और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बिना बड़े बाजार के यह फायदे सीमित रहेंगे. अगर ट्रैफिक ही कम रहेगा तो कमाई भी कम होगी. ऐसे में यह प्रोजेक्ट उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं दे पाएगा.

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि पाकिस्तान इस कॉरिडोर को कैसे सफल बनाता है। क्या वह भारत को इसमें शामिल करने की कोशिश करेगा या फिर नए बाजार तलाशेगा। फिलहाल हालात यह संकेत देते हैं कि यह प्रोजेक्ट अपने वर्तमान रूप में अधूरा है और इसे सफल बनाने के लिए बड़े बदलाव की जरूरत होगी।

भारत बिना कॉरिडोर अधूरा सपना ही रहेगा

पाकिस्तान का यह कदम पहली नजर में बड़ा और प्रभावशाली लगता है, लेकिन गहराई से देखने पर यह एक अधूरी रणनीति साबित होता है. कॉरिडोर बनाना आसान है, लेकिन उसे चलाने के लिए जरूरी है. बाजार, ट्रैफिक और स्पष्ट गंतव्य. इन तीनों में से सबसे अहम कड़ी भारत है, जो इस पूरे प्लान से बाहर है. यही वजह है कि यह “डेड एंड कॉरिडोर” बनकर रह सकता है.