Japan Nuclear Tragedy: धुआं, चीखें और लाशें; एक पल में मोम बन गए इंसान, हिरोशिमा परमाणु अटैक के 80 साल, धधक रहा है वो जख्म
79 वर्षीय कोसेई मितो, जो हमले के वक्त अपनी मां के गर्भ में थे, आज भी रेडिएशन से जूझ रहे हैं. वह कहते हैं, जब हमला ही जायज ठहराया जाए, तो परमाणु हथियारों का अंत कैसे होगा?
Japan Nuclear Tragedy: 6 अगस्त 1945, वो तारीख जब इंसानियत का सबसे काला अध्याय लिखा गया. जापान के हिरोशिमा शहर पर अमेरिका ने परमाणु बम गिराया था, जिसने पल भर में सब कुछ तबाह कर दिया. हज़ारों लोग जलकर राख हो गए, कई तो ऐसे थे जो मोम की तरह पिघल गए. शहर में केवल धुआं, चीखें और लाशें थीं.
आज इस भयावह घटना को 80 साल हो चुके हैं, लेकिन हिरोशिमा के ज़ख्म आज भी हरे हैं. हर साल की तरह इस साल भी जापान और दुनिया के लोग इस दिन को याद करते हुए सुबह 8:15 बजे मौन रखते हैं, ठीक उसी समय जब बम गिरा था. यह सिर्फ शोक का दिन नहीं, बल्कि शांति और चेतावनी का संदेश भी है.
मानवता पर गहरा धब्बा
हिरोशिमा पर गिरा परमाणु बम केवल एक हमला नहीं था, बल्कि मानवता पर गहरा धब्बा था. 6 अगस्त 1945 को अमेरिका ने "लिटिल बॉय" नाम का पहला परमाणु बम जापान के हिरोशिमा शहर पर गिराया. इस हमले में करीब 1,40,000 लोगों की जान गई, जिनमें बच्चे, महिलाएं और आम नागरिक शामिल थे.
इसके अगले ही दिन नागासाकी पर दूसरा बम गिराया गया, जिससे 70,000 से ज्यादा लोग मारे गए. यह हमला इतना भीषण था कि इंसानी शरीर पिघल गए, इमारतें उड़ गईं और ज़मीन पर सिर्फ राख बची.
80 साल बाद भी हरे हैं जख्म
आज, 80 साल बाद भी हिरोशिमा की गलियों में वो दर्द, वो कहानियां और वो यादें जिंदा हैं. जापान के प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा और हिरोशिमा के मेयर काजुमी मात्सुई ने समारोह में हिस्सा लेकर दुनिया से शांति की अपील की.
लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या वाकई दुनिया अब परमाणु मुक्त होने की ओर बढ़ रही है? 'निहोन हिदानक्यो' जैसे संगठनों का कहना है कि आज परमाणु खतरा पहले से कहीं ज्यादा है.
चौंकाने वाली बात यह है कि जापान खुद अभी तक परमाणु हथियारों की मनाही की संधि पर हस्ताक्षर नहीं कर पाया है. अमेरिका की न्यूक्लियर सिक्योरिटी शील्ड के अंतर्गत रहने के कारण जापान सरकार पर भी कई सवाल उठते हैं.
आज भी रेडिएशन से जूझ रहा ये शख्स
79 वर्षीय कोसेई मितो, जो हमले के वक्त अपनी मां के गर्भ में थे, आज भी रेडिएशन से जूझ रहे हैं. वह कहते हैं, जब हमला ही जायज ठहराया जाए, तो परमाणु हथियारों का अंत कैसे होगा?
हिरोशिमा की बरसी केवल एक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि अगर हमने इतिहास से सबक नहीं लिया, तो भविष्य फिर इसी तरह का कोई दिन देख सकता है.
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