जिस विधायक ने भारतीय राजनीति को दे दिया ‘आया राम, गया राम’ जैसा अमर मुहावरा, जानिए पूरी कहानी
1967 में हरियाणा के विधायक गया लाल के बार-बार पाला बदलने से ‘आया राम, गया राम’ मुहावरा चर्चित हुआ. जानिए कैसे कुछ घंटों की राजनीतिक हलचल ने भारतीय राजनीति को नया शब्द दे दिया.
भारतीय राजनीति में जब कोई नेता बार-बार अपना राजनीतिक पाला बदलता है, तो एक मुहावरा अक्सर सुनाई देता है- 'आया राम, गया राम'. आज यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि दल-बदल की राजनीति का पर्याय बन चुका है.
लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस मुहावरे के पीछे एक वास्तविक विधायक की कहानी है?
कहानी है हरियाणा के विधायक गया लाल की. साल था 1967. हरियाणा को बने अभी कुछ ही महीने हुए थे. राज्य में पहली विधानसभा के चुनाव हुए थे और किसी को अंदाजा नहीं था कि एक निर्दलीय विधायक के लगातार पाला बदलने की घटना आगे चलकर भारतीय राजनीति की शब्दावली का हिस्सा बन जाएगी.
गया लाल ने इतनी तेजी से राजनीतिक पाले बदले कि उनके नाम से जुड़ा यह किस्सा आज भी भारतीय राजनीति में मिसाल के तौर पर सुनाया जाता है.
लेकिन इस कहानी में सिर्फ गया लाल ही नहीं थे. उनके राजनीतिक पाला बदलने को सार्वजनिक रूप से चर्चित बनाने वाले नेता थे राव बीरेंद्र सिंह, जिन्होंने चंडीगढ़ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा था कि "गया राम अब आया राम हैं." यहीं से 'आया राम, गया राम' मुहावरा लोकप्रिय राजनीतिक भाषा का हिस्सा बन गया.
कहानी की शुरुआत हरियाणा के जन्म से होती है
हरियाणा 1 नवंबर 1966 को पंजाब से अलग होकर अलग राज्य बना. इसके बाद 1967 में पहली बार हरियाणा विधानसभा के चुनाव हुए. निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड में भी 1967 को हरियाणा के पहले विधानसभा चुनाव का वर्ष दर्ज किया गया है.
उस समय विधानसभा में कुल 81 सीटें थीं.
कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई और उसके खाते में 48 सीटें आईं. लेकिन यह बहुमत इतना मजबूत नहीं था कि पार्टी के भीतर होने वाली टूट को आसानी से संभाला जा सके.
10 मार्च 1967 को भगवत दयाल शर्मा ने हरियाणा के पहले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली.
लेकिन सरकार ज्यादा दिन नहीं चल सकी.
कांग्रेस के भीतर असंतोष बढ़ा और कुछ विधायकों ने पाला बदल लिया. इसी के साथ हरियाणा की राजनीति में जोड़-तोड़ और विधायकों की आवाजाही का दौर शुरू हो गया.
इसी राजनीतिक उथल-पुथल में सामने आए गया लाल
गया लाल 1967 के चुनाव में हसनपुर (SC) विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीते थे.
वह उस समय कोई राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेता नहीं थे.
लेकिन कुछ ही दिनों में उनका नाम पूरे देश की राजनीतिक चर्चा में आ गया.
क्यों?
क्योंकि सरकार बनाने और गिराने की कोशिशों के बीच विधायकों की संख्या बेहद महत्वपूर्ण हो गई थी. ऐसे माहौल में एक-एक विधायक का रुख सरकार के लिए निर्णायक हो सकता था.
गया लाल भी इसी राजनीतिक खींचतान का हिस्सा बन गए.
उन्होंने कांग्रेस का समर्थन किया.
फिर कांग्रेस से अलग होकर संयुक्त मोर्चे यानी United Front के साथ चले गए.
इसके बाद वह वापस कांग्रेस में आए.
और फिर कुछ ही घंटों के भीतर दोबारा संयुक्त मोर्चे में चले गए.
यानी एक ही राजनीतिक संकट के दौरान उनका पाला बदलना इतनी तेजी से हुआ कि यह घटना सामान्य दल-बदल से कहीं आगे निकल गई.
नौ घंटे में दो बार बदला पाला
गया लाल की कहानी का सबसे चर्चित हिस्सा यही है.
एनसीईआरटी के अनुसार, उन्होंने लगभग दो सप्ताह के भीतर तीन बार राजनीतिक पाला बदला. इनमें से कांग्रेस से संयुक्त मोर्चे और फिर कांग्रेस में वापसी तथा उसके बाद दोबारा संयुक्त मोर्चे में जाने की प्रक्रिया बेहद कम समय में हुई. कांग्रेस में वापस आने के बाद वह लगभग नौ घंटे के भीतर फिर संयुक्त मोर्चे में चले गए.
फिर राव बीरेंद्र सिंह ने ऐसा क्या कहा?
उस समय हरियाणा में राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे थे.
24 मार्च 1967 को राव बीरेंद्र सिंह मुख्यमंत्री बने. उन्होंने कांग्रेस से अलग हुए विधायकों और अन्य दलों के समर्थन से सरकार बनाई थी.
जब गया लाल फिर उनके साथ आए, तो राव बीरेंद्र सिंह उन्हें चंडीगढ़ में पत्रकारों के सामने लेकर पहुंचे.
यहीं उन्होंने वह मशहूर टिप्पणी की-
"गया राम अब आया राम हैं."
यह वाक्य तुरंत राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन गया.
बाद में यही 'आया राम, गया राम' के रूप में लोकप्रिय हुआ.
लेकिन असली कहानी सिर्फ एक विधायक की नहीं थी
गया लाल का किस्सा जितना दिलचस्प है, उसके पीछे उस समय की हरियाणा की पूरी राजनीतिक अस्थिरता को समझना भी जरूरी है.
1967 के चुनाव में कांग्रेस को बहुमत तो मिला था, लेकिन पार्टी के भीतर असंतोष और विधायकों के पाला बदलने से सरकार कमजोर हो गई.
कांग्रेस के कुछ विधायकों ने अलग होकर हरियाणा कांग्रेस नाम का समूह बनाया.
वहीं निर्दलीय विधायकों और अन्य दलों ने मिलकर United Front का गठन किया.
विधायकों के लगातार इधर-उधर जाने से सरकारों का समीकरण बदलता रहा. अंततः गैर-कांग्रेसी गठबंधन के नेतृत्व में राव बीरेंद्र सिंह मुख्यमंत्री बने.
यानी गया लाल का मामला किसी एक व्यक्ति का अचानक लिया गया फैसला नहीं था.
वह उस दौर की व्यापक दल-बदल की राजनीति का सबसे चर्चित चेहरा बन गए थे.
'आया राम, गया राम' संसद तक कैसे पहुंचा?
हरियाणा की घटना स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं रही.
मुहावरा तेजी से राष्ट्रीय राजनीतिक शब्दावली का हिस्सा बन गया.
भारतीय राजनीति में जब भी कोई विधायक या सांसद अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाता और फिर वापस लौटता, 'आया राम, गया राम' कहा जाने लगा.
एनसीईआरटी भी बताता है कि 1967 के चुनाव के बाद राज्यों में लगातार दल-बदल और राजनीतिक निष्ठा बदलने की घटनाओं ने इस अभिव्यक्ति को लोकप्रिय बनाया.
तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री वाई.बी. चव्हाण ने भी बाद में संसद में इस अभिव्यक्ति का इस्तेमाल राजनीतिक दल बदलने वाले नेताओं के संदर्भ में किया.
इस तरह हरियाणा के एक छोटे से राजनीतिक घटनाक्रम ने पूरे देश की राजनीति को एक नया मुहावरा दे दिया.
1967 सिर्फ 'आया राम, गया राम' का साल नहीं था
इस कहानी को समझने के लिए 1967 के चुनावों को समझना जरूरी है.
यह वह समय था जब स्वतंत्र भारत की राजनीति में कांग्रेस के लंबे प्रभुत्व को पहली बार कई राज्यों में गंभीर चुनौती मिली.
कई राज्यों में कांग्रेस बहुमत से दूर रही या उसके भीतर टूट हुई.
इसके बाद गैर-कांग्रेसी सरकारें बनाने के लिए अलग-अलग दलों और कांग्रेस से टूटकर निकले विधायकों के बीच गठजोड़ होने लगे.
एनसीईआरटी के अनुसार, 1967 के बाद राज्यों में दल-बदल ने सरकारों के बनने और गिरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. हरियाणा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से अलग हुए विधायकों ने गैर-कांग्रेसी सरकारों के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
यही वजह है कि 1967 को भारतीय राजनीति में दल-बदल के दौर की शुरुआत के महत्वपूर्ण वर्षों में गिना जाता है.
तब दल-बदल रोकने का कोई कानून नहीं था
आज अगर कोई विधायक अपनी पार्टी छोड़ता है या पार्टी के निर्देश के खिलाफ मतदान करता है, तो कुछ परिस्थितियों में उस पर संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता का प्रावधान लागू हो सकता है.
लेकिन 1967 में ऐसी कोई संवैधानिक व्यवस्था नहीं थी.
दल-बदल रोकने के लिए बाद में संविधान में 52वां संशोधन, 1985 किया गया और संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई.
इसमें राजनीतिक दल छोड़ने और पार्टी के निर्देश के विरुद्ध सदन में मतदान जैसी स्थितियों में सदस्यता समाप्त होने के प्रावधान किए गए.
यानी गया लाल वाला दौर उस समय का था, जब विधायक के पार्टी बदलने पर आज जैसी संवैधानिक अयोग्यता की व्यवस्था मौजूद नहीं थी.
फिर आया 1980 का हरियाणा और भजन लाल का किस्सा
'आया राम, गया राम' शब्द भले गया लाल से जुड़ा हो, लेकिन हरियाणा की दल-बदल राजनीति यहीं खत्म नहीं हुई.
1980 में भजन लाल ने भी हरियाणा की राजनीति में बड़े पैमाने पर दल-बदल का ऐसा उदाहरण पेश किया, जिसे भारतीय राजनीति में लंबे समय तक याद किया गया.
जनवरी 1980 में केंद्र में इंदिरा गांधी की वापसी के बाद हरियाणा की तत्कालीन जनता पार्टी सरकार के मुख्यमंत्री भजन लाल कांग्रेस में चले गए. उनके साथ बड़ी संख्या में विधायक भी कांग्रेस में आ गए और राज्य की सत्ता का समीकरण बदल गया.
इस घटना ने 'आया राम, गया राम' की पुरानी याद को फिर ताजा कर दिया.
लेकिन यहां भी फर्क समझना जरूरी है.
'आया राम, गया राम' मुहावरे का मूल स्रोत गया लाल की 1967 की घटना है.
भजन लाल की 1980 की घटना ने इस तरह की दल-बदल राजनीति को एक और बड़े स्तर पर चर्चा में ला दिया.
क्या गया लाल ने भारतीय राजनीति बदल दी थी?
यह कहना शायद अतिशयोक्ति होगा कि सिर्फ गया लाल ने भारतीय राजनीति बदल दी.
लेकिन यह कहना बिल्कुल सही है कि उनके नाम से जुड़ी घटना ने दल-बदल की राजनीति को पहचान देने वाला सबसे मशहूर मुहावरा जरूर दे दिया.
गया लाल की कहानी उस समय के राजनीतिक माहौल का प्रतीक बन गई, जब कुछ विधायकों का पाला बदलना सरकार बनाने और गिराने के लिए काफी हो सकता था.
आज के दौर में भी जब कोई नेता अचानक पार्टी बदलता है, तो 'आया राम, गया राम' शब्द सामने आ जाता है.
यानी लगभग छह दशक बाद भी एक 1967 की घटना राजनीतिक शब्दावली में जिंदा है.
इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू क्या है?
सबसे दिलचस्प बात यह है कि गया लाल उस समय कोई राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेता नहीं थे.
वह एक निर्दलीय विधायक थे.
लेकिन कुछ दिनों के भीतर किए गए उनके राजनीतिक फैसलों ने उनका नाम भारतीय राजनीतिक इतिहास में दर्ज करा दिया.
उनके नाम के साथ जुड़ा यह मुहावरा बाद में इतना लोकप्रिय हुआ कि पार्टी बदलने वाले नेताओं के लिए इसका इस्तेमाल देशभर में होने लगा.
और जिस नेता ने उन्हें पत्रकारों के सामने पेश करते हुए यह टिप्पणी की थी, यानी राव बीरेंद्र सिंह, वह भी हरियाणा की राजनीति में एक महत्वपूर्ण नाम बनकर उभरे.
इस तरह एक विधायक का पाला बदलना और एक मुख्यमंत्री की राजनीतिक टिप्पणी मिलकर भारतीय राजनीति की स्थायी शब्दावली का हिस्सा बन गए.
निष्कर्ष: गया लाल एक नाम नहीं, एक राजनीतिक दौर की पहचान बन गए
'आया राम, गया राम' की कहानी सिर्फ एक विधायक के बार-बार पार्टी बदलने की कहानी नहीं है.
यह उस दौर की कहानी है, जब राज्यों में कांग्रेस का एकछत्र राजनीतिक प्रभुत्व कमजोर पड़ रहा था, गठबंधन सरकारें आकार ले रही थीं और विधायकों की राजनीतिक निष्ठा सरकारों के भविष्य का फैसला कर सकती थी.
गया लाल ने पाला बदला, राव बीरेंद्र सिंह ने टिप्पणी की और भारतीय राजनीति को एक ऐसा मुहावरा मिल गया, जो आज तक इस्तेमाल होता है.
बाद में दल-बदल रोकने के लिए 1985 में संविधान की दसवीं अनुसूची लाई गई. लेकिन राजनीति में पार्टी बदलने की बहस पूरी तरह खत्म नहीं हुई.
इसलिए जब भी किसी नेता के लगातार राजनीतिक पाला बदलने पर सवाल उठता है, करीब छह दशक पुराना वही नाम फिर सामने आ जाता है- गया लाल.
और उनके साथ जुड़ा वह मशहूर राजनीतिक मुहावरा- 'आया राम, गया राम'.