'सलवार का नाड़ा खोलना अश्लील हरकत नहीं, 'रेप की कोशिश' जैसा; SC ने फटकार लगाते खारिज किया HC का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने महिला से जुड़े एक यौन अपराध केस में कहा कि किसी महिला को गलत नीयत से पकड़ना और उसकी सलवार का नाड़ा खोलना महज 'छेड़छाड़' या 'रेप की तैयारी' नहीं, बल्कि सीधे तौर पर 'रेप का प्रयास' (Attempt to Rape) है.

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Reepu Kumari

महिलाओं के खिलाफ हो रहे यौन अपराध वाले एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा फैसला सुनाया जो किसी उदाहरण से कम नहीं. देश के सर्वोच्च अदालत ने मामले की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले को खारिज कर दिया. कोर्ट ने स्पष्ट और सख्त लहजे में कहा कि किसी महिला को गलत नीयत से पकड़ना और उसकी सलवार का नाड़ा खोलना महज छेड़छाड़ या रेप की तैयारी नहीं, बल्कि सीधे तौर पर रेप का प्रयास (Attempt to Rape) माना जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट ने आगे क्या कहा?

कुछ दिन पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महिला के साथ रेप की कोशिश केस में ऐसा फैसला सुनाया था जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी. कोर्ट ने कहा कि ये मामला बहुत ही गंभीर है. इस तरह के केस में अगर इस कृत्य को गंभीर अपराध नहीं माना जाएगा तो अपराधी को कड़ी सजा नहीं जा सकती जो पीड़िता के लिए नाइंसाफी होगी. एक तरह से यह न्याय की भावना के खिलाफ भी है. अदलात ने इसी के साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट के मार्च 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि यह केवल महिला की लज्जा भंग करने का मामला है.

जानते हैं क्या है पूरा मामला?

रिपोर्ट के अनुसार इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक बेहद ही संवेदनशील मामले की सुनवाई हो रही थी. जिसमें आरोपियों ने पीड़िता के साथ अश्लील हरकते की. साथ ही कपड़े उतारने की भी कोशिश की. जब ये मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट के पास गया तो अदालत ने एक चौंकने वाला फैसला सुना दिया. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ऐसा तर्क दिया जो सुप्रीम कोर्ट को न्यायसंगत नहीं लगा. अदालत ने इसे रेप मानने से ही इंकार कर दिया था.

हाईकोर्ट के अनुसार यह कृत्य 'रेप की तैयारी' के अंतर्गत आता है.जानकारी के लिए आपको बता दें इस तरह के अपराध में आरोपी को इसके लिए कम सजा होती है. हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद लोगों में गुस्सा फैल गया. पीड़िता को इंसाफ दिलाने के लिए महिला अधिकार संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों सामने आए. इस फैसले की कड़ी आलोचना की. 

सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान

मामले की गंभीरता को समझते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया. SC ने यह कदम तब उठाया जब एनजीओ 'वी द वुमन' की संस्थापक और वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने एक लेटर लिख कर इस मामले को उठाया. फिर सुप्रीम कोर्ट की एक विशेष बेंच ने इस फैसले की सुनवाई की. स्पेशल बेंच में मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के साथ-साथ न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया शामिल थे.

SC का संख्त फैसले, हाई कोर्ट का फैसला 

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद ना केवल इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया साथ ही फटकार भी लगाई. कोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ पोक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत 'रेप के प्रयास' के मूल और सख्त आरोपों को बहाल कर दिया है. CJI सूर्यकांत ने कोर्ट में न्यायिक संवेदनशीलता पर जोर देते हुए हाईकोर्ट को नसीहत भी दे डाली. उन्होनें कहा जब कोई न्यायाधीश यौन अपराधों से जुड़े केस की सुनवाई कर रहा है तो उन्हें मामले की तथ्यात्मक हकीकत और पीड़िता की कमजोरियों के प्रति विचारशील होना चाहिए.

जज को सलाह

सुप्रीम कोर्ट ने जज और अदालतों को कहा कि जब तक आप पीड़िता की कमजोरियों के प्रति विचारशील नहीं होंगे और मुकदमे के तथ्यों की वास्तविकताओं पर फोकस नहीं करेंगे तब तक आप सही तरीके से  न्याय नहीं कर पाएंगे.

'करुणा और सहानुभूति का भाव भी जरुर' 

कोर्ट ने कहा न्यायाधीशों में करुणा और सहानुभूति का भाव भी होना जरुरी है. अगर ये भाव नहीं होंगे तब तक न्यायिक संस्थान अपने महत्वपूर्ण कर्तव्यों का निर्वहन ठीक से नहीं कर पाएंगे,

सुप्रीम कोर्ट ने लिया बड़ा फैसला 

सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य में ऐसा ना हो इसके लिए एक व्यापक सुधार का खाका भी तैयार कर लिया है. SC ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के निदेशक और पूर्व जस्टिस अनिरुद्ध बोस से विशेषज्ञों की एक समिति गठन करने की अपील की है. यह समिति इस तरह के अपराध मामले में और अन्या मामले में जजों के लिए 'संवेदनशीलता और करुणा' विकसित करने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करेगी. अदलात ने यह भी साफ किया है कि उसकी भाषा बहुत सिंपल रखी जाए.