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दिल्ली सांप्रदायिक दंगों के आरोपी उमर खालिद को फिर झटका, सुप्रीम कोर्ट ने जमानत को लेकर खारिज की रिव्यू याचिका

सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद की रिव्यू याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने जनवरी 2026 में उनकी जमानत याचिका पहले ही ठुकरा चुका था. वह सितंबर 2020 से हिरासत में हैं.

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Sagar Bhardwaj

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व जेएनयू छात्र उमर खालिद को बड़ा झटका दिया है. अदालत ने दिल्ली दंगा साजिश मामले में उनकी जमानत याचिका पर दिए गए अपने फैसले की समीक्षा की मांग वाली रिव्यू याचिका को खारिज कर दिया. जस्टिस अरविंद कुमार और एनवी अंजरिया की पीठ ने 16 अप्रैल के आदेश में कहा कि याचिका में कोई दम नहीं है. खालिद ने सीनियर वकील कपिल सिब्बल के जरिए खुली अदालत में सुनवाई की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने वह अनुरोध भी ठुकरा दिया.

खुली अदालत में सुनवाई से इनकार 

उमर खालिद की तरफ से सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने 13 अप्रैल को जस्टिस अरविंद कुमार के सामने मामले का जिक्र करते हुए अनुरोध किया था कि रिव्यू याचिका को खुली अदालत में सुना जाए, न कि चैंबर में फैसला किया जाए. हालांकि जस्टिस कुमार ने संक्षिप्त में कहा था कि वह कागजात देखेंगे और जरूरत पड़ी तो इसे बुला लेंगे. अंततः कोर्ट ने यह फैसला चैंबर में ही सुनाया. न्यायाधीशों ने कहा कि रिव्यू याचिका और उससे जुड़े दस्तावेजों को पढ़ने के बाद हमें इस पर कोई दलील सुनने की जरूरत नहीं लगती. याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने साफ किया कि पिछले फैसले में कोई गलती नहीं है.

क्या है पूरा मामला और सुप्रीम कोर्ट का रुख  

उमर खालिद पर फरवरी 2020 में दिल्ली के पूर्वोत्तर इलाकों में हुए सांप्रदायिक दंगों की साजिश रचने का आरोप है, जिसमें 53 लोग मारे गए थे और सैकड़ों घायल हुए थे. सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी 2026 को उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी, यह कहते हुए कि उनके खिलाफ प्राथमिक तौर पर मामला बनता है. कोर्ट ने उन्हें और सह-आरोपी शरजील इमाम को साजिश का “केंद्रीय और रचनात्मक” हिस्सा बताया था. अदालत ने यह भी कहा था कि सिर्फ लंबी कैद के आधार पर यूएपीए जैसे सख्त कानून में जमानत नहीं दी जा सकती, जहां देश की सुरक्षा और एकता का सवाल हो.

अब तक हिरासत में है उमर खालिद

उमर खालिद 13 सितंबर 2020 से जेल में हैं. वहीं शरजील इमाम 28 जनवरी 2020 से हिरासत में हैं. कोर्ट ने साफ किया कि दोनों की भूमिका बाकी आरोपियों से कहीं अधिक अहम है. जनवरी में जमानत देते हुए कोर्ट ने पांच अन्य आरोपियों को राहत दी थी, लेकिन कहा था कि खालिद और इमाम उनसे “गुणात्मक रूप से अलग” हैं. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यूएपीए के तहत अगर प्राथमिक तौर पर केस बनता दिख रहा हो तो लंबी कैद जमानत का आधार नहीं बन सकती. खालिद अब अगली सुनवाई के लिए कम से कम एक साल का इंतजार करेंगे.

रिव्यू पिटीशन खारिज होने के मायने 

रिव्यू पिटीशन खारिज होने का मतलब है कि अब सुप्रीम कोर्ट अपने जनवरी वाले फैसले में कोई बदलाव नहीं करेगा. खालिद के वकीलों का तर्क था कि उन्हें बिना ट्रायल के सजा दी जा रही है और कई सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल हुई हैं, लेकिन कोर्ट ने इसे नहीं माना. जस्टिस कुमार और अंजरिया की पीठ ने साफ लिखा कि रिव्यू याचिका में कोई ठोस आधार नहीं है. अब उमर खालिद के पास सुप्रीम कोर्ट में इससे ऊपर कोई विकल्प नहीं बचा है. वह क्यूरेटिव पिटीशन दायर कर सकते हैं, लेकिन उसकी संभावना बेहद कम होती है. फिलहाल उनकी जमानत की उम्मीदों पर पूरी तरह पानी फिर गया है.