पुलवामा बलिदानी दिवस: ब्लैक डे नहीं आतंक के खात्मे का दिन, जब 12 दिनों के भीतर भारत ने लिया था 40 सपूतों का बदला

14 फरवरी 2019 को पुलवामा में जैश-ए-मोहम्मद के हमले में 40 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए थे. यह दिन अब वैलेंटाइन डे नहीं, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ भारत के मजबूत संकल्प का प्रतीक बन चुका है.

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Reepu Kumari

नई दिल्ली: सात साल पहले 14 फरवरी 2019 को जब दुनिया वैलेंटाइन डे मना रही थी, पुलवामा में एक भयानक आतंकी हमला हुआ. केसर के खेतों के पास लेथपोरा में सीआरपीएफ के काफिले पर आत्मघाती हमलावर ने 300 किलो से ज्यादा विस्फोटक से भरा वाहन टकराया, जिसमें 40 जवान शहीद हो गए. जैश-ए-मोहम्मद ने जिम्मेदारी ली, जिसके पीछे पाकिस्तान की आईएसआई का हाथ था. इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया और आतंक के खिलाफ भारत की नीति में बड़ा बदलाव लाया. आज यह दिन बलिदानियों की याद में आतंकवाद के समूल नाश का संकल्प दिवस बन गया है.

शहीदों का बलिदान और तत्काल प्रतिक्रिया

हमले के बाद पूरा देश एकजुट हो गया. सरकार ने साफ संदेश दिया कि अब आतंक को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. सिर्फ 12 दिन बाद 26 फरवरी को भारतीय वायुसेना ने बालाकोट में जैश के बड़े प्रशिक्षण शिविर पर एयरस्ट्राइक की. यह 1971 के बाद पहली बार था जब भारतीय विमान पाकिस्तान की सीमा में घुसकर हमला कर रहे थे. इस ऑपरेशन ने दुनिया को दिखाया कि नया भारत अब चुप नहीं बैठेगा.

अनुच्छेद 370 की समाप्ति से बदला माहौल

पुलवामा के बाद सरकार ने जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद और आतंक को जन्म देने वाले प्रावधानों पर करारा प्रहार किया. अनुच्छेद 370 और 35ए को खत्म कर दिया गया. इससे अलग संविधान और अलगाववादी तंत्र को मिलने वाली हवा बंद हो गई. नतीजा यह हुआ कि आतंकी भर्ती और ओवरग्राउंड वर्कर्स का नेटवर्क टूट गया. आज घाटी में आतंक का पारिस्थितिकी तंत्र लगभग नष्ट हो चुका है.

जैश का कश्मीर में पतन

जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख कमांडर जैसे उमर फारूक और इस्माइल अल्वी सहित कई आतंकी सुरक्षाबलों ने धर दबोचे. मुख्य गुनाहगार मसूद अजहर पाकिस्तान में है, लेकिन घाटी में जैश को अब स्थानीय कैडर या सहयोगी नहीं मिल रहे. संगठन अब छद्म नामों का सहारा ले रहा है. हमले की तैयारी 2017-18 से चल रही थी, लेकिन बालाकोट के बाद जैश ने बड़े हमलों की योजना छोड़ दी.

कश्मीर में अब सुरक्षा और विश्वास

पिछले सात सालों में कुछ हमले हुए जरूर, लेकिन वे अपवाद हैं. आम लोगों के चेहरों पर अब भय नहीं, बल्कि विश्वास और सामान्य जीवन की उम्मीद दिखती है. आतंकी घटनाओं में कमी आई है और घाटी में विकास के काम तेज हुए हैं. पुलवामा के शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया-इसने आतंक के खिलाफ निर्णायक लड़ाई की नींव रखी.

ब्लैक डे नहीं, संकल्प दिवस

कुछ लोग इसे ब्लैक डे कहते हैं, क्योंकि 40 वीरों ने बलिदान दिया. लेकिन जम्मू-कश्मीर के जानकारों का मानना है कि यह अब आतंक के खिलाफ प्रहार और मिशन को आगे बढ़ाने का दिन है. 40 शहीदों ने जो कीमत चुकाई, उसने अनुच्छेद 370 की समाप्ति और जिहादी तत्वों के सफाए की पटकथा लिखी. आज पूरा देश इस संकल्प को दोहराता है-आतंक का अंत होगा.