मनोरंजन से लत तक: बच्चों में गेमिंग के जाल पर विशेषज्ञ ने चेताया
प्रो. शर्मा के अनुसार, गेमिंग कई बार बच्चों के लिए एक 'कोपिंग मैकेनिज्म' (तनाव से निपटने का तरीका) बन जाती है. वास्तविक दुनिया की बातचीत की जगह डिजिटल वातावरण ले लेता है.
नई दिल्ली: देशभर में हाल के हफ्तों में ऑनलाइन गेमिंग और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच, नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (निम्हांस) के एक वरिष्ठ विशेषज्ञ ने चेताया है कि अत्यधिक गेमिंग अक्सर गहरी मनोवैज्ञानिक संवेदनशीलता का संकेत होती है.
पिछले 15 दिनों में विभिन्न राज्यों से ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें बच्चों के अत्यधिक गेम खेलने के कारण लंबे समय तक एकांत में रहना, स्कूल से अनुपस्थिति, नींद का बाधित होना और भावनात्मक दूरी जैसी समस्याएं देखी गई.
अभिभावकों के लिए परामर्श जारी
दिल्ली-एनसीआर और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों के स्कूलों ने अभिभावकों के लिए परामर्श जारी किए हैं. वहीं, बाल कल्याण परामर्शदाताओं ने ऐसे मामलों को संभाला है, जहां नाबालिग बच्चे टास्क-आधारित और रिवार्ड-आधारित ऑनलाइन गेम्स में गहराई से उलझ गए.
मनोवैज्ञानिक जोखिमों पर ध्यान केंद्रित
इसी पृष्ठभूमि में गाजियाबाद में तीन नाबालिग बहनों की दुखद मृत्यु- जिसकी विभिन्न पहलुओं से जांच जारी है ने बहस को और तेज कर दिया है. हालांकि, प्रशासन सभी पहलुओं की जांच कर रहा है, लेकिन एक ऑनलाइन टास्क-आधारित गेम में गहरी संलिप्तता की खबरों ने डिजिटल माध्यमों के मनोवैज्ञानिक जोखिमों पर ध्यान केंद्रित किया है.
निम्हांस में प्रोफेसर और भारत के पहले टेक-डी-एडिक्शन केंद्र 'SHUT क्लिनिक' (Service for Healthy Use of Technology) के प्रभारी डॉक्टर प्रो. मनोज कुमार शर्मा ने कहा कि ऐसे मामले केवल अधिक स्क्रीन टाइम का परिणाम नहीं होते.
डिजिटल पहचान विकसित होगी
उन्होंने कहा, “बच्चों में एक बहुत मजबूत डिजिटल पहचान विकसित हो सकती है, जो कभी-कभी उनकी वास्तविक (ऑफलाइन) पहचान को पीछे छोड़ देती है. लंबे समय तक अलगाव और स्कूल से दूरी उनकी संवेदनशीलता को बढ़ा देती है.'
शोध और अकादमिक प्रशिक्षण
प्रो. शर्मा के अनुसार, गेमिंग कई बार बच्चों के लिए एक 'कोपिंग मैकेनिज्म' (तनाव से निपटने का तरीका) बन जाती है. 'वास्तविक दुनिया की बातचीत की जगह डिजिटल वातावरण ले लेता है,' उन्होंने कहा कि निम्हांस, जो स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन ‘राष्ट्रीय महत्व का संस्थान’ है और बेंगलुरु, कर्नाटक में स्थित है, मानसिक स्वास्थ्य और न्यूरोसाइंसेज के क्षेत्र में एक प्रमुख केंद्र है. यह संस्थान मनोचिकित्सा, न्यूरोलॉजी, न्यूरोसर्जरी, मनोविज्ञान और संबंधित मस्तिष्क विज्ञानों में उपचार, शोध और अकादमिक प्रशिक्षण प्रदान करता है.
प्रो. शर्मा ने बताया कि कई ऑनलाइन गेम्स मनोवैज्ञानिक ट्रिगर्स का उपयोग करते हैं, जैसे टास्क पूरा करने पर इनाम और लगातार उपलब्धियों की श्रृंखला. “जो शुरुआत में केवल मनोरंजन लगता है, वह धीरे-धीरे एक गहन और लत में बदलने वाले पैटर्न का रूप ले सकता है,” उन्होंने कहा.
संतुलित डिजिटल आदतों पर जोर
उन्होंने चेतावनी दी कि समस्यात्मक गेमिंग का संबंध अवसाद, चिंता और आत्महत्या के विचारों से भी हो सकता है. इसके साथ ही नींद की कमी और मूड में उतार-चढ़ाव जैसी समस्याएं भी जुड़ी रहती हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया घटनाएं संकेत देती हैं कि समस्या केवल स्क्रीन टाइम तक सीमित नहीं है, बल्कि उस मनोवैज्ञानिक डूबाव से जुड़ी है जो डिजिटल प्लेटफॉर्म पैदा करते हैं. निम्हांस ने लगातार प्रारंभिक पहचान, अभिभावकों की सक्रिय भागीदारी और संतुलित डिजिटल आदतों पर जोर दिया है.
डिजिटल नियमन और जागरूकता पर बढ़ती चर्चा के बीच प्रो. शर्मा की चेतावनी यह याद दिलाती है कि जब डिजिटल पहचान वास्तविक जीवन के संबंधों पर हावी होने लगे, तो समय रहते हस्तक्षेप करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है.