NCERT की किताब से हटाया जाएगा न्यायपालिका में 'भ्रष्टाचार' वाला हिस्सा, चीफ जस्टिस की आपत्ति के बाद सरकार का यू-टर्न

सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर 'गंभीर चिंता' जताई है. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत किसी को भी संस्था को बदनाम करने की अनुमति नहीं देगी.

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नई दिल्ली: NCERT की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की किताब को लेकर नया विवाद सामने आया है. सरकारी सूत्रों ने संकेत दिया है कि किताब में न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार से जुड़े संदर्भ को हटाया जाएगा.

सूत्रों का कहना है कि इस तरह की बातों को पाठ्यपुस्तक में शामिल करना उचित नहीं था. उनका मानना है कि बच्चों को प्रेरणादायक विषय पढ़ाए जाने चाहिए. इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मुद्दे पर गंभीर चिंता व्यक्त की है.

भ्रष्टाचार के उल्लेख को हटाया जाएगा

सूत्रों के मुताबिक, किताब के संशोधित अध्याय 'हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका' में न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार और कदाचार के उल्लेख को हटाया जाएगा. यह हिस्सा पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई के जुलाई 2025 के बयान पर आधारित था, जिसमें उन्होंने न्यायपालिका में कुछ मामलों के कारण जनता के भरोसे पर असर पड़ने की बात कही थी. सरकार का कहना है कि इस तरह का संदर्भ देना उपयुक्त नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी

सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर 'गंभीर चिंता' जताई है. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत किसी को भी संस्था को बदनाम करने की अनुमति नहीं देगी. उन्होंने संकेत दिया कि इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया जा सकता है. बताया गया है कि उच्च न्यायालयों के कुछ न्यायाधीश भी इस उल्लेख से असहज थे.

वकीलों की अलग-अलग राय

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस मुद्दे को उठाते हुए सवाल किया कि केवल न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का जिक्र क्यों. उन्होंने कहा कि अन्य संस्थानों में भी समस्याएं हैं, लेकिन उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है. वहीं, वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने भी 'चयनात्मक' दृष्टिकोण पर आपत्ति जताई. उनका कहना था कि यदि विषय शामिल करना है तो व्यापक संदर्भ के साथ होना चाहिए.

किताब में क्या था उल्लेख?

किताब में अदालतों की संरचना और कार्यप्रणाली समझाने के साथ-साथ लंबित मामलों और पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर भी चर्चा की गई थी. इसमें बताया गया था कि न्यायाधीश आचार संहिता से बंधे होते हैं और जवाबदेही के आंतरिक तंत्र मौजूद हैं. साथ ही यह भी लिखा था कि पारदर्शिता बढ़ाने और तकनीक के उपयोग से सुधार के प्रयास जारी हैं.

'समझ की कमी दर्शाता है'

वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा का कहना है कि कक्षा आठ के स्तर पर विद्यार्थियों को शासन के अंगों की बुनियादी जानकारी दी जानी चाहिए, न कि जटिल विवाद. सुप्रीम कोर्ट की वकील प्रज्ञा परिजात सिंह ने भी कहा कि बिना ठोस विश्लेषण के ऐसे विषय शामिल करना समझ की कमी दर्शाता है. उनका मानना है कि न्यायपालिका की भूमिका को संतुलित दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाना चाहिए.