ईरान-अमेरिका तनाव से बढ़ी तेल की तपिश, कच्चा तेल महंगा; भारत पर पड़ेगा कितना असर?
भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने वैश्विक बाजारों की चिंता बढ़ा दी है. भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए महंगा क्रूड आर्थिक मोर्चे पर कई चुनौतियां खड़ी कर सकता है.
नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा मध्य पूर्व में जारी अनिश्चितता का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है. कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने दुनिया भर के निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है. मंगलवार को तेल की कीमतों में उछाल के बीच भारतीय शेयर बाजार पर भी दबाव देखने को मिला.
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल पेट्रोल और डीजल की कीमतों तक सीमित नहीं रहता. तेल महंगा होने से परिवहन, लॉजिस्टिक्स और उत्पादन की लागत बढ़ सकती है. इसका असर धीरे-धीरे रोजमर्रा की कई वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है. यही वजह है कि दुनिया के बड़े आयातक देश मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और तेल बाजार की गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं.
हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर भी दुनिया की नजर
मध्य पूर्व की स्थिति में हॉर्मुज जलडमरूमध्य की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल है. इस रास्ते से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और अन्य ऊर्जा उत्पाद वैश्विक बाजारों तक पहुंचते हैं.
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अगर क्षेत्रीय तनाव के कारण इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर किसी तरह का व्यवधान पैदा होता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका बढ़ सकती है. ऐसी स्थिति में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक और तेज उछाल देखने को मिल सकता है.
इसी संभावना को लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में चिंता बनी हुई है. निवेशक यह आकलन करने में जुटे हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव किस दिशा में जाता है और इसका ऊर्जा आपूर्ति पर कितना असर पड़ सकता है.
भारत के लिए क्यों अहम है तेल का भाव?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए आयातित कच्चे तेल पर निर्भर है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है.
अगर कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची बनी रहती है, तो भारत को तेल खरीदने के लिए ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ सकती है. इससे व्यापार घाटे और चालू खाते पर दबाव बढ़ने की संभावना रहती है.
महंगा तेल रुपये के लिए भी चुनौती पैदा कर सकता है. मंगलवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में कमजोरी देखने को मिली और रुपया करीब दो सप्ताह के निचले स्तर तक पहुंच गया.
महंगे तेल से बढ़ सकती है महंगाई की चिंता
कच्चा तेल अर्थव्यवस्था के लगभग हर हिस्से से जुड़ा हुआ है. पेट्रोल और डीजल की कीमतों के अलावा परिवहन, कृषि, विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों पर भी इसका असर पड़ता है.
उदाहरण के तौर पर ट्रकों और दूसरे मालवाहक वाहनों की परिचालन लागत बढ़ने पर सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का खर्च बढ़ सकता है. इसका असर कंपनियों की लागत और अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंचने वाली कीमतों पर पड़ सकता है.
यानी अगर तेल की कीमतों में तेजी लंबे समय तक बनी रहती है, तो महंगाई को लेकर चिंता बढ़ सकती है. इससे सरकार और केंद्रीय बैंक के लिए भी आर्थिक संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है.
शेयर बाजार पर भी दिखा असर
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर भारतीय शेयर बाजार में भी देखने को मिला. Reuters की रिपोर्ट के अनुसार मंगलवार को भारतीय शेयरों में दबाव रहा और वित्तीय कंपनियों के शेयरों में कमजोरी देखने को मिली.
निवेशक इस समय वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमत, रुपये की चाल और अमेरिका की मौद्रिक नीति से जुड़े संकेतों पर नजर बनाए हुए हैं.
तेल की कीमतों में अचानक तेजी आमतौर पर उन कंपनियों के लिए चिंता का कारण बनती है जिनकी लागत ऊर्जा और परिवहन पर अधिक निर्भर है. वहीं कुछ ऊर्जा कंपनियों को ऊंची कीमतों से अलग तरह का फायदा मिल सकता है. यही वजह है कि बाजार में अलग-अलग सेक्टरों पर इसका असर भी अलग-अलग दिखाई देता है.
आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर?
अगर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी लंबे समय तक जारी रहती है, तो इसका अप्रत्यक्ष असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है. परिवहन लागत बढ़ने से कई वस्तुओं की कीमतों पर दबाव आ सकता है.
हालांकि घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अंतरराष्ट्रीय क्रूड की हर तेजी का असर तुरंत और उसी अनुपात में दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है. घरेलू ईंधन कीमतों पर कई अन्य कारक भी प्रभाव डालते हैं.
इसलिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत कितने समय तक ऊंची रहती है और आने वाले दिनों में भू-राजनीतिक तनाव किस दिशा में बढ़ता है.
आगे क्या होगा?
तेल बाजार के लिए आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान संबंध और मध्य पूर्व की स्थिति सबसे महत्वपूर्ण कारकों में रहेंगे. अगर तनाव और बढ़ता है या तेल आपूर्ति को लेकर कोई बड़ा जोखिम पैदा होता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है.
वहीं अगर दोनों देशों के बीच बातचीत आगे बढ़ती है और तनाव कम होता है, तो तेल बाजार को कुछ राहत मिल सकती है. ऐसी स्थिति में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी पर भी अंकुश लग सकता है.
भारत के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यही है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को नियंत्रण में रखा जा सके. लंबे समय तक महंगा क्रूड देश के आयात बिल, रुपये, महंगाई और आर्थिक विकास पर दबाव बढ़ा सकता है. इसलिए आने वाले दिनों में तेल की कीमतों के साथ-साथ अमेरिका-ईरान के घटनाक्रम पर भी भारत की नजर बनी रहेगी.