EXPLAINER: RBI को क्यों सता रही महंगाई की चिंता? यहां स्टेप बाय स्टेप समझिए गवर्नर संजय मल्होत्रा का बयान
आरबीआई की एमपीसी की मीटिंग आज हो गई है. इसमें गवर्नर संजय मल्होत्रा ने महंगाई को लेकर चिंता जताई है. यहां गवर्नर के बयान को आसान भाषा में समझिए.
EXPLAINER:आसमान छूती महंगाई हर आम और खास इंसान के बजट को बिगाड़ देती है और जब देश का केंद्रीय बैंक इसे लेकर चिंता जताने लगे तो समझ लेना चाहिए कि आने वाले दिन हमारी जेब पर भारी पड़ने वाले हैं. भारतीय रिजर्व बैंक ने आज अपनी नई मॉनेटरी पॉलिसी का एलान किया है. इस घोषणा के दौरान आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने महंगाई को लेकर एक बहुत ही अहम मैसेज भी दिया है.
हालांकि राहत की बात यह है कि फिलहाल महंगाई नियंत्रण में है लेकिन रिजर्व बैंक का मानना है कि आने वाले महीनों में कीमतों का दबाव तेजी से बढ़ सकता है. इसी अनिश्चितता और जोखिम को देखते हुए आरबीआई ने लगातार तीसरी बार अपनी प्रमुख ब्याज दर यानी 'रेपो रेट' को 5.25% पर बरकरार रखने का फैसला किया है.
गवर्नर संजय मल्होत्रा ने समझाया कि देश और दुनिया में कई ऐसे हालात बन रहे हैं जो आने वाले समय में महंगाई की आग को और भड़का सकते हैं. इसी आशंका के चलते आरबीआई ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए अपने महंगाई के अनुमान को 4.6% से बढ़ाकर 5.1% कर दिया है.
आखिर क्यों चिंता में है रिजर्व बैंक?
आरबीआई की इस चिंता के पीछे सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में चल रहा जिओ-पॉलिटिकल तनाव और युद्ध के हालात हैं. इस टकराव की वजह से दुनिया भर के ऊर्जा बाजार में भारी अनिश्चितता पैदा हो गई है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. जब कच्चा तेल महंगा होता है तो ट्रांसपोर्टेशन यानी कि माल ढुलाई और कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ जाती है जिसका सीधा असर हर छोटी-बड़ी चीजों की कीमतों पर पड़ता है.
चूंकि भारत अपनी जरूरत का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशों से इम्पोर्ट करता है इसलिए दुनिया भर में बढ़ती कमोडिटी की कीमतें अंत में भारतीय उपभोक्ताओं की जेब पर ही भारी पड़ती हैं.
फायनेंशियल ईयर 27 में कैसा रहेगा महंगाई का ग्राफ?
आरबीआई के नए अनुमानों के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2026-27 में रिटेल महंगाई दर एवरेज 5.1% के आसपास रह सकती है. अगर हम तिमाही के हिसाब से देखें तो इसका अनुमान कुछ इस तरह है.
पहली तिमाही (Q1 FY27): 4.2%
दूसरी तिमाही (Q2 FY27): 5.1%
तीसरी तिमाही (Q3 FY27): 5.9%
चौथी तिमाही (Q4 FY27): 5.4%
इन आंकड़ों से साफ है कि साल के बीच में खासकर तीसरी तिमाही में महंगाई बहुत तेजी से बढ़ेगी और यह आरबीआई की अधिकतम बर्दाश्त करने की सीमा 6% के बिल्कुल करीब पहुंच जाएगी. हालांकि 'कोर इन्फ्लेशन' जिसमें उतार-चढ़ाव वाले खाद्य और ईंधन उत्पाद शामिल नहीं होते के 4.7% के आसपास रहने की उम्मीद है.
आरबीआई ने ब्याज दरें क्यों नहीं बढ़ाईं?
दुनिया भर के कई केंद्रीय बैंक महंगाई से लड़ने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी का सख्त रास्ता अपना रहे हैं लेकिन आरबीआई ने ऐसा नहीं किया. रिजर्व बैंक का मानना है कि भारत में महंगाई बढ़ने का कारण ग्राहकों की तरफ से अत्यधिक मांग होना नहीं है. बल्कि 'सप्लाई-साइड' की दिक्कतें हैं.
आसान शब्दों में कहें तो लोग बहुत ज्यादा पैसे खर्च कर रहे हैं इसलिए चीजें महंगी नहीं हो रही हैं बल्कि चीजों को बनाना और उन्हें एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना महंगा हो गया है जिसकी वजह से दाम बढ़ रहे हैं. यही वजह है कि आरबीआई ने तुरंत ब्याज दरें बढ़ाने के बजाय 'देखो और इंतजार करो' की रणनीति चुनी है.
असल खतरा कहां से आ रहा है?
आरबीआई के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बढ़ती लागत है. थोक मूल्य सूचकांक यानी WPI पर आधारित थोक महंगाई दर अप्रैल में बढ़कर 8.3% पर पहुंच गई जो पिछले 42 महीनों का सबसे उच्चतम स्तर है. इसका मतलब है कि फैक्ट्रियों और कंपनियों को कच्चा माल बहुत महंगा मिल रहा है. जब कंपनियों की लागत बढ़ेगी तो वे इसका बोझ ग्राहकों पर ही डालेंगी जिससे आने वाले समय में रिटेल महंगाई बढ़नी तय है. इसके अलावा मई महीने से पेट्रोल और डीजल के दामों में भी तेजी देखी गई है. अनुमानों के अनुसार पेट्रोल की कीमतें करीब 7.4% बढ़ी हैं और डीजल की कीमतें तकरीबन 8.4% बढ़ी हैं.
ईंधन का महंगा होना सीधे तौर पर लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट को बढ़ाता है जिससे फल-सब्जियों से लेकर फैक्ट्रियों में बनने वाले सामान तक सब कुछ महंगा हो जाता है. एलपीजी, केमिकल्स, रबर और प्लास्टिक जैसे उद्योगों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है.
मानसून और अल नीनो का डबल अटैक
मौसम का मिजाज भी इस बार महंगाई को भड़काने में बड़ी भूमिका निभा सकता है. इस साल मानसून के सामान्य से कमजोर रहने की आशंका है और साथ ही 'अल नीनो' का खतरा भी मंडरा रहा है. कमजोर बारिश का सीधा असर खेती पर पड़ता है. कृषि उत्पादन और अनाजों की पैदावार घटने से मंडियों में फल, सब्जियों और दालों की आवक कम होने से फूड इन्फ्लेशन यानी खाद्य महंगाई बढ़ सकती है.
चूंकि भारतीय परिवारों के बजट का एक बड़ा हिस्सा खाने-पीने पर खर्च होता है इसलिए खाद्य पदार्थों की कीमतों में मामूली तेजी भी कुल महंगाई को बहुत ऊपर ले जाती है. हालांकि राहत की बात यह है कि सरकार के पास अनाज का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और जलाशयों में पानी का स्तर भी ठीक है.
क्या है आरबीआई का अंतिम संदेश?
आरबीआई का लॉन्ग-टर्म डर यह है कि अगर महंगाई लंबे समय तक बनी रही तो इसके 'सेकंड-राउंड इफेक्ट्स' शुरू हो सकते हैं. यानी जब लोगों को लगने लगता है कि महंगाई कम नहीं होगी तो कर्मचारी ज्यादा सैलरी की मांग करने लगते हैं और कंपनियां अपने प्रॉडक्ट्स के दाम और बढ़ा देती हैं. इस सर्किल को रोकना ही रिजर्व बैंक की प्राथमिकता है.
निवेशकों और आम जनता के लिए केंद्रीय बैंक का संदेश बिल्कुल साफ है- महंगाई फिलहाल काबू में है लेकिन आने वाले समय में जोखिम बड़े हैं. आरबीआई कच्चे तेल की कीमतों, मिडिल ईस्ट के संकट और मानसून की स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए है और वह विकास को सहारा देने के साथ-साथ वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा.