Shradh Tithi Kaise Pata Kare: मृत्यु की तारीख पता है, तिथि नहीं याद? ऐसे पंचांग से जानें पितर का श्राद्ध कब करें
पितृ पक्ष में पितरों का श्राद्ध उनकी मृत्यु की तिथि के अनुसार करने की परंपरा है. कई बार परिवार को अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख तो मालूम होती है, लेकिन उस दिन की हिंदू तिथि पता नहीं होती. ऐसे में पंचांग की मदद से सही तिथि जानी जा सकती है.
नई दिल्ली: पितृ पक्ष में अपने पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण करने वाले परिवारों के सामने अक्सर एक सवाल खड़ा हो जाता है. मृत्यु की तारीख तो याद है, लेकिन उस दिन हिंदू पंचांग के अनुसार कौन-सी तिथि थी, यह पता नहीं होता. ऐसी स्थिति में श्राद्ध की सही तिथि को लेकर भ्रम होना स्वाभाविक है. हालांकि, पुराने पंचांग या ऑनलाइन पंचांग की सहायता से अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख को हिंदू तिथि में बदला जा सकता है.
मान लीजिए किसी व्यक्ति के पिता का निधन 1 अगस्त 1998 को हुआ था. परिवार को यह तारीख पता है, लेकिन मृत्यु किस तिथि को हुई थी, इसकी जानकारी नहीं है. ऐसी स्थिति में 100 साल वाले पंचांग या किसी विश्वसनीय ऑनलाइन पंचांग में वर्ष, महीना और तारीख देखी जा सकती है. 1 अगस्त 1998 की जानकारी देखने पर पता चलता है कि उस दिन सावन शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि थी.
कैलेंडर के बारे में जानें
पंचांग में तिथि देखने के बाद एक बात समझना भी जरूरी है. अंग्रेजी कैलेंडर में आधी रात के बाद तारीख बदल जाती है, लेकिन हिंदू पंचांग की तिथि 24 घंटे की तय अवधि वाली नहीं होती. वह कभी कम तो कभी ज्यादा समय तक रह सकती है. इसलिए तिथि निर्धारित करने में सूर्योदय का विशेष महत्व होता है. दिए गए उदाहरण में अष्टमी सुबह 6:42 बजे तक थी, जबकि सूर्योदय 5:42 बजे हो चुका था. इसलिए उस दिन अष्टमी मानी जाएगी.
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जब न पता हो मृत्यु की तारीख
इस तरह अगर किसी व्यक्ति के निधन की तारीख 1 अगस्त 1998 है, तो पंचांग से उसकी मृत्यु तिथि अष्टमी निर्धारित की जा सकती है. इसके बाद पितृ पक्ष में अष्टमी तिथि आने पर उस पूर्वज के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जा सकता है. पितृ पक्ष में प्रतिपदा से अमावस्या तक अलग-अलग तिथियां होती हैं. परंपरा के अनुसार जिस तिथि को व्यक्ति का निधन हुआ हो, पितृ पक्ष में उसी तिथि पर उसका श्राद्ध किया जाता है.
अगर परिवार को किसी सदस्य की मृत्यु की तारीख ही मालूम नहीं है, तो ऐसी स्थिति में भी श्राद्ध के लिए व्यवस्था बताई गई है. पितृ पक्ष की सर्वपितृ अमावस्या, जिसे आश्विन अमावस्या भी कहा जाता है, ऐसे पूर्वजों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है. इस दिन उन परिजनों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जा सकता है, जिनकी मृत्यु की तिथि या तारीख परिवार को ज्ञात नहीं है. इसलिए पुरानी तारीख याद होने पर घबराने की जरूरत नहीं है. उस तारीख को संबंधित वर्ष के पंचांग में खोजकर तिथि देखी जा सकती है. ध्यान रखें कि ऊपर दिया गया 1 अगस्त 1998 का उदाहरण इसी जानकारी को समझाने के लिए है. वास्तविक श्राद्ध की तिथि तय करते समय स्थानीय पंचांग और सूर्योदय के समय के अनुसार पुष्टि करना उचित रहेगा.
Disclaimer: यहां दी गई सभी जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. theindiadaily.com इन जानकारियों की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह ले लें.