जून को क्यों कहते हैं प्राइड मंथ, क्या है इसका इतिहास?


प्राइड मंथ

    दुनिया भर में जून का महीना प्राइड मंथ के रूप में मनाते हैं. आमतौर पर इसे LGBTQ+ कम्युनिटी के लोग मनाते हैं.

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LGBTQ+ कम्युनिटी

    भारत के अलावा कई ऐसे देश है जहां LGBTQ+ समुदाय के लोगों स्वीकारते नहीं हैं. इसी वजह से कम्युनिटी समाज में बराबरी का हिस्से के लिए अलग-अलग जगहों पर रेंबो फ्लैग के साथ परेड निकालते है

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प्राइड मंथ का इतिहास

    प्राइड मंथ का इतिहास 28 जून 1969 से जुड़ा हुआ है जब पुलिस ने स्टोनवेल पर छापा मारा था, जो न्यूयॉर्क शहर के ग्रीनविच विलेज में युवा LGBTQ+ लोगों के लिए एक फेमस जगह है.

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क्याें मारा छापा?

    पुलिस ने बिना लाइसेंस के शराब बेचने के आरोप में लोगों को गिरफ्तार किया और कई के साथ दुर्व्यवहार किया. जिसकी वजह से LGBTQ+ने आंदोलन शुरू किया.

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प्राइड मार्च

    28 जून, 1970 को, स्टोनवेल मामले का एक साल होने के अवसर पर, न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स और शिकागो में पहला प्राइड मार्च हुआ. इस मार्च ने LGBTQ+कम्युनिटी के लिए समानता और उनकी आवाज को उठाने का काम किया था.

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रेंबो फ्लैग

    रेंबो फ्लैग को गिल्बर्ट बेकर ने डिजाइन किया है. लाल जीवन का प्रतीक है, ऑरेंज हीलिंग का प्रतीक है, पीला सूर्य के प्रकाश का प्रतीक है, हरा प्रकृति का प्रतीक है, नीला एकता का प्रतीक है, और पर्पल आत्मा का प्रतीक है.

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भारत में पहला प्राइड मार्च

    भारत में पहला प्राइड मार्च 2 जुलाई 1999 को कोलकाता में हुआ था. तब से, देश भर के 21 से ज्यादा में प्राइड मार्च आयोजित किए गए हैं.

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कैसे मनाते हैं प्राइड मंथ?

    प्राइड मंथ को अलग-अलग तरह से मनाया जाता है. परेड, रैलियों, सेमिनार, म्यूजिक फेस्टिवल, वर्कशॉप,कॉन्सर्ट सहित कई तरह से मनाया जाता है.

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LGBTQ+ समुदाय

    यह मार्च न केवल कम्युनिटी को अपनेपन की भावना को बढ़ावा देती हैं बल्कि LGBTQ+ समुदाय के सामने आने वाली चुनौतियों और मुद्दों के बारे में जागरूकता भी बढ़ाती हैं.

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