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लोगों को मिलेगी खुशखबरी! Income TAX रेट में बदलाव करने जा रही है मोदी सरकार?

Income Tax Slab: 18वीं लोकसभा के लिए सरकार का चयन हो चुका है और जल्द ही वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के नेतृत्व में पूर्णकालिक बजट पेश किया जाएगा. इसको लेकर वित्त विभाग से जुड़े अधिकारियों ने कहा कि टैक्स में कटौती डिस्पोजेबल इनकम बढ़ाने के लिए अधिक प्रभावी उपाय हो सकता है, जिसके परिणामस्वरूप कंजम्पशन में बढ़ोतरी होगी और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा.

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Nirmala Sitharaman
Courtesy: IDL

Income Tax Slab: भारतीय अर्थव्यवस्था इन दिनों सुस्त खपत (consumption) की जटिल समस्या से जूझ रही है. मांग में कमी के चलते उत्पादन और इनवेस्टमेंट भी प्रभावित हो रहे हैं. इस जटिल परिस्थिति से निपटने के लिए सरकारी नीति निर्माता मौजूदा इनकम टैक्स ढांचे को आसान बनाने पर विचार टैक्स रहे हैं, खासकर कम आय वाले वर्गों के लिए राहत देने पर ध्यान दिया जा रहा है.

दो सरकारी सूत्रों से द इंडियन एक्सप्रेस की बातचीत के अनुसार, वित्तीय एकीकरण (fiscal consolidation) पर ध्यान केंद्रित करते हुए, मुफ्त उपहार (Freebies) या अत्यधिक कल्याणकारी खर्च (welfare spending) की बजाय, कम कमाने वालों के लिए टैक्स की दरों में कटौती को प्राथमिकता दी जा सकती है.

खपत बढ़ाने के लिए हो सकती है टैक्स में कटौती

स्पेशलिस्ट का मानना है कि खपत को बढ़ावा देना ही मांग को फिर से जिंदा करने और अर्थव्यवस्था को गति देने का सबसे कारगर उपाय है. इससे इनवेस्टमेंट साइकिल को फिर से शुरू करने में मदद मिलेगी, खासकर कंज्यूमर-सेंट्रिक फील्ड में निजी पूंजी व्यय (private capital expenditure) को बढ़ावा मिलेगा. साथ ही, उम्मीद है कि इससे वस्तु एवं सेवा टैक्स (GST) संग्रह में भी बढ़ोतरी होगी.

एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि टैक्स रैशनलाइजेशन (tax rationalisation) से खपत को बढ़ावा दिया जा सकता है. लोगों के पास अधिक डिस्पोजेबल आय होगी, जिसका मतलब है अधिक खपत, अधिक आर्थिक गतिविधियां और अधिक जीएसटी संग्रह. इससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह से राजस्व संग्रह में तेजी आ सकती है. दरअसल, टैक्स कटौती से कंपनियों के लिए भी प्रत्यक्ष टैक्स संग्रह बढ़ सकता है क्योंकि उनके पास रिपोर्ट करने के लिए अधिक आय होगी.

नए टैक्स स्लैब में इनकम से ज्यादा तेजी से बढ़ता है टैक्स रेट

चर्चा के दौरान इस बात पर भी ध्यान दिया गया कि मौजूदा टैक्स स्लैब में सीमांत इनकम टैक्स (marginal income tax) की बढ़ोतरी "बहुत तेज" है. अधिकारी ने बताया कि, "अभी, नई टैक्स प्रणाली में आपका पहला स्लैब 5% से 3 लाख रुपये से शुरू होता है. जब तक यह 15 लाख रुपये तक पहुंचता है, जो पांच गुना है, सीमांत टैक्स की दर 5% से बढ़कर 30% हो जाती है - यह छह गुना की उछाल है. तो जहां आय पांच गुना बढ़ती है, वहीं सीमांत टैक्स की दर छह गुना बढ़ जाती है, जो काफी ज्यादा है."

हालांकि, टैक्स कटौती से होने वाले राजस्व घाटे का गतिशील विश्लेषण (dynamic analysis) जरूरी है. अधिकारियों का कहना है कि "चूंकि इससे मांग बढ़ने की उम्मीद है, शुद्ध प्रभाव का आकलन करने के लिए एक सामान्य संतुलन विश्लेषण (general equilibrium analysis) की जरूरत है. लोगों के हाथ में अधिक पैसा होगा, जिससे बेहतर खपत और अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष टैक्स राजस्व प्राप्त होगा. इसलिए भले ही राजस्व का कुछ नुकसान हो, लेकिन कुल प्रभाव सकारात्मक हो सकता है."

फ्रीबीज से ज्यादा कारगर टैक्स स्लैब में कटौती

सरकारी कल्याणकारी योजनाओं (welfare schemes) पर होने वाले खर्च में लीकेज (leakages) की संभावना रहती है, जबकि लो इनकम वर्गों के लिए टैक्स की दर में कटौती अक्सर उच्च खपत की ओर ले जाती है. यह मांग को बढ़ावा देता है, जो इनवेस्टमेंट को गति देने के लिए महत्वपूर्ण है, खासकर प्राइवेट इंडस्ट्रीज द्वारा, जो पिछले कई सालों से सुस्त पड़ा हुआ है.

टैक्स सरलीकरण को भी कल्याणकारी योजनाओं पर सीधे खर्च करने से बेहतर उपाय माना जा रहा है. एक अन्य अधिकारी ने कहा, "हमारा राजकोषीय घाटा (fiscal deficit) बहुत कम नहीं है. गरीबों को राहत पहुंचाने के लिए राजकोषीय अस्थिरता की कीमत पर खर्च नहीं किया जा सकता है. खपत सरकारी योजनाओं के माध्यम से उत्पन्न आर्थिक गतिविधियों से आना चाहिए, न कि सब्सिडी कूपन से. यह टैक्स कटौती के माध्यम से किया जा सकता है, खासकर लो इनकम वर्गों के लिए."

पूर्णकालिक बजट पेश करने की तैयारी में मोदी सरकार

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार जुलाई के तीसरे सप्ताह तक वित्त वर्ष 2024-25 के लिए पूर्ण बजट पेश किए जाने की उम्मीद है. हालांकि भारत ने पिछले तीन सालों में औसतन 7 प्रतिशत से अधिक की जीडीपी विकास दर दर्ज की है, लेकिन उसे कमजोर कृषि विकास, कमजोर निर्यात और सुस्त खपत मांग के बीच निजी इनवेस्टमेंट की कमी जैसी महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. निजी इनवेस्टमेंट में व्यापक रूप से बढ़ोतरी नहीं हुई है और कमजोर मांग भारतीय इंडस्ट्रीज के लिए एक चिंता का विषय बनी हुई है.

31 मई को जारी जनवरी-मार्च तिमाही के लिए नवीनतम जीडीपी आंकड़ों में, खपत मांग का एक संकेतक निजी अंतिम खपत व्यय (पीएफसीई), जीडीपी के अनुपात के रूप में घटकर 52.9 प्रतिशत हो गया - जो 2011-12 आधार वर्ष श्रृंखला में निम्नतम स्तर है. वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए पूरे वर्ष, खपत व्यय में 4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जो महामारी वर्ष को छोड़कर पिछले दो दशकों में सबसे धीमी बढ़ोतरी दर है.

राजकोषीय घाटे को भी कम करेगा ये फैसला

सरकार पिछले कुछ सालों से राजकोषीय एकीकरण पर ध्यान केंद्रित टैक्स रही है, जिसका लक्ष्य 2024-25 में राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 5.1 प्रतिशत तक कम करना और 2025-26 में इसे और घटाकर 4.5 प्रतिशत से नीचे करना है. अपने 2021-22 के बजट भाषण में, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2025-26 तक 4.5 प्रतिशत के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को रेखांकित किया था. 

उन्होंने कहा था, "हमारा लक्ष्य है कि पहले तो बेहतर अनुपालन के माध्यम से टैक्स राजस्व की उछाल को बढ़ाकर और दूसरा, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों और भूमि सहित परिसंपत्तियों के विमुद्रीकरण से प्राप्त आय में बढ़ोतरी करके समेकन हासिल किया जाए."

वित्त वर्ष 2023-24 के लिए, सरकार राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 5.6 प्रतिशत पर सीमित करने में सफल रही, जो कि बेहतर से बेहतर टैक्स राजस्व और कम सब्सिडी भुगतान के कारण रिवाइज्ड प्रोजेक्शन में 5.8 प्रतिशत से कम है.

टैक्स सरलीकरण से मिलेगा खपत को बढ़ावा

यह कदम देश की अर्थव्यवस्था को गति देने और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है. टैक्स कटौती और टैक्स सरलीकरण से खपत को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है, जिससे निजी इनवेस्टमेंट को भी बल मिलेगा. हालांकि, राजकोषीय एकीकरण के टारगेट को प्राप्त करने के साथ-साथ आर्थिक बढ़ोतरी को भी संतुलित करना सरकार के लिए एक चुनौती होगी. इस बजट में सरकार किस तरह से इस चुनौती का सामना करती है, यह देखना होगा.