Homeopathy day: दुनिया भर में बीमारियों का इलाज करने के लिए कई अलग-अलग तरह के तरीके अपनाए जाते रहे हैं, लेकिन 3 मेथडयां ऐसी हैं जो दुनिया भर में सबसे ज्यादा मशहूर हैं. इसमें से एक होम्योपैथी भी है जिसका आगाज करीब 2 सदी पहले हुआ था. 18वीं सदी को खोज, क्रांति और बदलाव का समय माना जाता है और इस दौरान कई ऐसी महत्वपूर्ण खोजें हुई जिसने हमारे आधुनिक समाज को नींव दी.
18वीं सदी में हुई इन खोजों में होम्योपैथी मेथड भी शामिल हैं जिसकी खोज जर्मनी में रहने वाले डॉ. हैनिमैन ने की थी. यही वजह है कि उनके जन्मदिन को दुनिया विश्व होम्योपैथी दिवस के रूप में मनाती है. आइए, इस दिन के इतिहास और होम्योपैथी से जुड़े कुछ अनोखे तथ्यों पर एक नजर डालते हैं.
जर्मनी में रहने वाले डॉ. हैनिमैन 18वीं शताब्दी के अंत की मेडिकल सुविधाओं और इलाज करने के तरीकों से नाखुश थे. उनका मानना था कि दवाइयां अक्सर रोग को बढ़ा देती हैं. इसी खोज में उन्होंने होम्योपैथी के सिद्धांत को विकसित किया. उनका मूल सिद्धांत "Like Disease Like Cures" (जैसी बीमारी वैसा इलाज) था. उन्होंने पाया कि बीमारी पैदा करने वाले पदार्थ को बहुत कम मात्रा में देने से शरीर बीमारी से लड़ने की क्षमता विकसित कर लेता है.
डॉ. हैनिमैन के रिसर्च और प्रयोगों ने होम्योपैथी की नींव रखी. धीरे-धीरे यह मेथड यूरोप और दुनिया के अन्य भागों में फैलने लगी. भारत में भी 19वीं शताब्दी में होम्योपैथी की शुरुआत हुई और आज यह एक लोकप्रिय चिकित्सा मेथड बन चुकी है.
होम्योपैथिक दवाएं प्राकृतिक पदार्थों जैसे पौधों, खनिजों और जानवरों के पदार्थों से बनती हैं. इन पदार्थों को इतना कम मात्रा में मिलाया जाता है कि कई बार तो उनका एक अणु भी दवा में नहीं रहता. विज्ञान के अनुसार इस मात्रा का कोई मेटेरियल इम्पैक्ट (material impact) शरीर पर नहीं होता है, ये अनोखी बात है.
होम्योपैथिक दवाओं को बहुत कम मात्रा में दिया जाता है, जिन्हें "पोटेंसीकृत" (potentized) रूप में जाना जाता है. इस प्रक्रिया में दवा के पदार्थ को बार-बार पतला किया जाता है और प्रत्येक पतलाकरण के साथ उसे जोरदार तरीके से हिलाया जाता है. होम्योपैथी के अनुयायी मानते हैं कि यह प्रक्रिया दवा की शक्ति को बढ़ा देती है.
होम्योपैथी का दावा है कि यह दवाएं शरीर की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करती हैं. यह कैसे होता है, इस बारे में होम्योपैथी का अपना सिद्धांत है.
होम्योपैथी एक विवादास्पद विषय है, खासकर वैज्ञानिक जगत में. होम्योपैथी की प्रभावशीलता को लेकर कई अध्ययन किए गए हैं. कुछ अध्ययनों से संकेत मिले हैं कि यह पारंपरिक दवाओं के समान प्रभावी हो सकती है, जबकि अन्य अध्ययन इसके प्रभाव को निष्क्रिय (placebo) प्रभाव के समान बताते हैं. निष्क्रिय प्रभाव का मतलब है कि मरीज को जो दवा दी जा रही है, उसमें वास्तव में कोई रोग-निवारक तत्व नहीं है, लेकिन रोगी को यह विश्वास हो जाने से ही उसमें सुधार होता है.
वैज्ञानिक समुदाय का मानना है कि होम्योपैथी के सिद्धांत फिजिक्स और केमिस्ट्री के मूल सिद्धांतों से विरोधाभास रखते हैं. इतने कम मात्रा में दवा के किसी भी तरह से शरीर पर असर होने की संभावना नहीं है. होम्योपैथी एक लोकप्रिय चिकित्सा मेथड है, लेकिन इसके वैज्ञानिक प्रमाणों को लेकर अभी भी सवाल उठाए जाते हैं. होम्योपैथी दिवस हमें इस मेथड के इतिहास और इसके पीछे के सिद्धांतों को समझने का अवसर देता है.