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1980 के मुरादाबाद दंगों की क्या है कहानी, जिसको दशकों तक छुपाती रही सरकारें

उत्तर प्रदेश सरकार ने विधानसभा के पटल पर 1980 में हुए मुरादाबाद दंगो की जांच के लिए गठित आयोग की रिपोर्ट को मंगलवार को सदन के पटल पर रखा. उसके एक दिन बाद संसद के मानसून सत्र के दौरान लोकसभा में गृहमंत्री अमित शाह और स्मृति ईरानी ने अपने संबोधन में इसका जिक्र किया.

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Shubhank Agnihotri
1980 के मुरादाबाद दंगों की क्या है कहानी, जिसको दशकों तक छुपाती रही सरकारें

 

नई दिल्लीः उत्तर प्रदेश सरकार ने विधानसभा के पटल पर 1980 में हुए मुरादाबाद दंगो की जांच के लिए गठित आयोग की रिपोर्ट को मंगलवार को सदन के पटल पर रखा. उसके एक दिन बाद संसद के मानसून सत्र के दौरान लोकसभा में गृहमंत्री अमित शाह और स्मृति ईरानी ने अपने संबोधन में इसका जिक्र किया. सत्ता में आईं तमाम दलों की सरकारें इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से बचती रहीं लेकिन 43 साल बाद उत्तर प्रदेश की बीजेपी सरकार ने 1980 में हुए इन दंगों की रिपोर्ट को सार्वजनिक कर दिया. मुरादाबाद में हुए इन दंगों को दूसरा जलियांवाला बाग भी कहे जाने का आरोप लगा जिसमें सुरक्षा में तैनात पीएसी ने भीड़ पर गलत तरीके से फायरिंग कर ना जाने कितने लोगों को मौत की नींद सुला दिया था. रिपोर्ट के अनुसार इन दंगों को एक स्थानीय मुस्लिम नेता ने अपने राजनैतिक फायदे के लिए भड़काया था.


आखिर क्या हुआ था उस दिन?

साल 1980 के स्वतंत्रता दिवस मनाए जाने के दो दिन पहले हुई इस हिंसा ने सैकड़ों लोगों के घरों को उजाड़ दिया. स्वतंत्रता दिवस से ठीक दो दिन पहले देश में ईद मनाई जा रही थी.  उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में ईदगाह के मैदान में हजारों मुसलमान नमाज अता करने के लिए इकट्ठा हुए थे. इस दौरान अफवाह उड़ाई गई कि नमाज स्थल पर अपवित्र माने जाने वाला जानवर (सूअर) घुस आया है. यह अफवाह जैसे ही लोगों के कानों तक पहुंची वहां पर मौजूद सभी नमाजियों में आक्रोश भड़क गया. नमाज करने के लिए ईदगाह से लेकर सड़कों तक हजारों मुसलमानों की भीड़ इकट्ठा हुई थी.  रिपोर्ट के अनुसार, जिनकी संख्या 50 हजार के आस-पास रही होगी. अपवित्र जानवर की खबर लगते ही ईदगाह से लेकर मुरादाबाद की सड़कों पर हिंसा, पत्थरबाजी और भगदड़ मच गई. त्योहार का रंग दंगों और मातम में बदल गया. देखते ही देखते पूरा जिला भीषण दंगों की चपेट में आ गया.

भीड़ ने थाना फूंका, बच्चों को भी नहीं बख्शा
गुस्साए लोगों ने तीन पुलिस थानों को आग के हवाले कर दिया. अनियंत्रित भीड़ को काबू करने के लिए आगे आए प्रशासनिक अधिकारियों में एडीएम सिटी डीपी सिंह को गुस्साई भीड़ ने मार डाला. इस दंगे में तीन सिपाहियों ने भी अपनी जान गंवा दी. दंगों की इस भीषण विभीषिका ने बच्चों और महिलाओं को भी नहीं बख्शा उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया गया.  दंगों पर नियंत्रण पाने के लिए तत्कालीन उत्तर प्रदेश कांग्रेस सरकार के मुखिया वीपी सिंह ने पीएसी के जवानों और बड़ी संख्या में अर्धसैनिक बलों को तैनात कर दिया. पीएसी की गोलीबारी में भी कुछ लोगों की जानें गई थीं.

इंदिरा सरकार ने बताया विदेशी साजिश

उत्तर प्रदेश ने मुरादाबाद में हुए इन भीषण दंगों के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि इसमें 83 लोग मारे गए वहीं 112 लोग घायल हुए. मीडिया रिपोर्ट और चश्मदीदों का कहना था कि इस दंगे में कम से कम 200 से ज्यादा लोग मारे गए हैं. दंगों का असर इतना व्यापक था कि उस समय केंद्र में इंदिरा सरकार को भी इसमें दखल देना पड़ा था. इंदिरा गांधी ने इन दंगों को विदेशी साजिश करार दिया था.


खाड़ी देशों के साथ संबंधों पर भी पड़ा था अस

यह दंगे इतने गंभीर थे कि इस पर भारत के कूटनीतिक और व्यापिरक रिश्तों पर भी असर पड़ा था. खाड़ी के देशों ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी. दंगों की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन सीएम वीपी सिंह ने जस्टिस एमपी सक्सेना की अध्यक्षता में एक न्यायिक आयोग गठित कर दिया था.


आयोग ने रिपोर्ट सौंपी, सरकार ने चुप्पी साधी

आयोग ने इन दंगों की रिपोर्ट 20 नवंबर 1983 को सरकार को सौंप दी लेकिन सरकार ने इस रिपोर्ट को न तो किसी सदन में रखा और न इस रिपोर्ट को कभी सार्वजनिक किया. इस वजह से इन दंगों में अपनों को खोने वालों को न तो न्याय मिल सका और न ही मुआवजा. इस मसले को लेकर तमाम संघटन बने उनकी रिपोर्ट बनीं सरकार को खत लिखे गएजिनमें मांग की गई पीड़ितों को न्याय मिले, अपराधियों पर कड़ी कार्रवाई हो लेकिन इन तमाम प्रयासों के बाबजूद भी मामला सिफर का सिफर ही रहा.

सार्वजिनक की गई रिपोर्ट 
दंगे की घटना के 43 साल बाद यूपी की योगी सरकार ने दंगों की जांच के लिए गठित किए गए सक्सेना आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक कर दिया. मंगलवार को सीएम योगी आदित्यनाथ ने इस रिपोर्ट को उत्तर प्रदेस विधानसभा के पटल पर रखा. रिपोर्ट के अनुसार, एक स्थानीय मुस्लिम नेता पर गलत अफवाह फैलाने और दंगे भड़काने का आरोप लगा है जिसने अपने रोजनैतिक फायदे के लिए सैकड़ों जिंदगियों को मौत के हवाले कर दिया. इस मुस्लिम नेता का नाम अमीम अहमद खान बताया गया है.

आयोग ने किया दोषमुक्त 
इस रिपोर्ट में जिला प्रशासन, पुलिस और पीएसी पर पर जो गलत तरीके से कार्रवाई और फायरिंग के आरोप लगे थे. आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इन सबको दोषमुक्त करार दिया था. गौरतलब है कि इन दंगों में किसी  भी हिंदू संगठन की भूमिका नहीं पाई गई थी.

 

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