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25 साल पहले हुई पहली घटना, क्या घाटी में फिर से लौट रहा टारगेट किलिंग का दौर?

घाटी में सितंबर 1989 में पहली टारगेट किलिंग की घटना सामने आई. करीब 25 सालों से टारगेट किलिंग की घटना लगातार जारी है. टारगेट किलिंग के तहत आतंकी गैर मुस्लिमों, स्थानीय पुलिस के जवानों, सुरक्षाबलों, सरकारी कर्मचारियों को लगातार निशाना बनाते हैं.

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Om Pratap
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बात आजादी के वक्त यानी 1947 की है. जब भारत से अलग देश यानी पाकिस्तान बन रहा था, तब उसकी पूरी मंशा था कि मुस्लिम बहुल वाला इलाका यानी कश्मीर उसके हिस्से में आए. लेकिन ये संभव न हो सका. इसके बाद कश्मीर को भारत से छीनने की साजिशें रची जाने लगी. 

आजादी के मात्र दो महीने के बाद यानी 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान की ओर से एक साजिश रची गई, जिसे जिसे 'ऑपरेशन गुलमर्ग' का नाम दिया गया. इसके तहत पाकिस्तान से हजारों की संख्या में पाकिस्तानियों को साजिश के तहत कश्मीर भेजा जाने लगा. 

पाकिस्तानियों ने उरी और बारामूला पर धावा बोलकर कब्जा कर लिया. उस वक्त के राजा हरि सिंह ने परिस्थितियों को भांपते हुए भारत सरकार से मदद मांगी. फिर भारत ने मदद के बदले विलय की शर्त रखी. आखिरकार चार दिनों के बाद यानी 26 अक्टूबर 1947 को राजा हरि सिंह ने जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय वाले पत्र पर साइन किया. इसके एक दिन बाद ही भारतीय सेना श्रीनगर पहुंच गई. 

भारतीय सेना के श्रीनगर पहुंचने के बाद पाकिस्तानियों को खदेड़ा गया. मामला संयुक्त राष्ट्र तक पहुंचा तो आजादी के एक साल बाद यानी अगस्त 1948 में UN ने संघर्ष विराम का प्रस्ताव रख दिया. करीब 5 महीने बाद यानी जनवरी 1949 को संघर्ष विराम पर सहमति बनी और जहां तक पाकिस्तानी लड़ाके घुसे थे, वहां से नियंत्रण रेखा यानी एलओसी का जन्म हुआ. वो हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में रह गया जिसे पीओके कहा जाता है. 

ये वही इलाका है, जिसके जरिए पाकिस्तान आए दिन घुसपैठ करता है और घाटी यानी कश्मीर में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देता रहता है. 

1949 में संघर्ष विराम के बाद भी पाकिस्तान की नापाक हरकतें जारी रही. 1965, 1971 और 1999 की जंग इसका उदाहरण है. अब जब पाकिस्तान के अंदर जंग में उतरने की हिम्मत नहीं है, तो उसने घाटी यानी कश्मीर में टारगेट किलिंग नाम से ऑपरेशन शुरू कर दिया, जिसके तहत बाहरियों, गैर मुस्लिमों और सुरक्षाबलों के साथ-साथ स्थानीय पुलिस को निशाना बनाया जाता है.

5 अगस्त 2019 में कश्मीर समेत जम्मू से अनुच्छेद हटाए जाने के बाद पाकिस्तान जैसे बौखला गया और टारगेट किलिंग की घटनाओं की बाढ़ आ गई. हालांकि भारतीय सेना ने मुंहतोड़ जवाब दिया और आतंकियों को चुन-चुन कर ठिकाने लगाया. पिछले कुछ दिनों से घाटी शांत थी, लेकिन अचानक बुधवार की शाम एक बार फिर टारगेट किलिंग की घटना सामने आई. 

श्रीनगर के हब्बा कदल इलाके में बुधवार यानी 7 फरवरी की शाम को आतंकियों ने सिख समुदाय के दो लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी. मृतकों की पहचान पंजाब के निवासी अमृतपाल और रोहित के रूप में हुई. टारगेट किलिंग की हालिया घटना के बाद एक बार फिर सुरक्षाबल मुस्तैद हो गए हैं और आतंकियों की तलाश में सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है. ऐसे में सवाल ये कि आखिर टारगेट किलिंग कब और कैसे रूकेगी?

क्या होता है टारगेट किलिंग?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, टारगेट किलिंग के तहत किसी शख्स (पुलिस या सेना का जवान, सरकारी कर्मचारी, गैर हिंदू) की कुछ दिनों तक रेकी की जाती है. उसके आने-जाने की टाइमिंग नोट की जाती है. इसी पैटर्न पर आतंकी किसी की निगरानी करते हैं और फिर टारगेट किलिंग को अंजाम देते हैं. 

आंकड़ों के मुताबिक, 1990 से लेकर 2024 तक यानी पिछले 34 साल में आतंकियों ने घाटी में टारगेट किलिंग की गई घटनाओं को अंजाम दिया है. इन घटनाओं में 13 हजार से ज्यादा लोगों को निशाना बनाया गया है. हालांकि, इतने ही समय में सुरक्षाबलों ने 25 हजार से ज्यादा दहशतगर्दों को ढेर भी किया है. 

1989 को हुई पहली टारगेट किलिंग

माना जाता है कि 1971 की जंग में  हार और फिर बांग्लादेश के अलग हो जाने के बाद से पड़ोसी मुल्क बदले की आग में जलने लगा. उसने कश्मीर की भारत से आजादी के नाम पर यहां के स्थानीय लोगों खासकर युवाओं को हथियार पकड़ाना शुरू कर दिया. 1990 के बाद तो हालात बिलकुल बदल गए. 

कभी कश्मीर में हिंदुओं की संख्या करीब 15 फीसदी हुआ करती थी, जो अब मात्र 0.1 फीसदी ही बची है. जानकारी के मुताबिक, घाटी में सबसे पहली टारगेट किलिंग की घटना 14 सितंबर 1989 को हुई, जब श्रीनगर में पहले हिंदू की हत्या हुई. इसके बाद से टारगेट किलिंग का सिलसिला शुरू हो गया. 

टारगेट किलिंग का आखिर क्या है कारण?

घाटी में पुलिस के जवान, कश्मीरी पंडित, बाहर से आकर मजदूरी करने वाले लोग आखिर आंतकियों के टारगेट पर क्यों होते हैं? खुफिया एजेंसियों की माने तो घाटी में टारगेट किलिंग का पूरा जाल पड़ोसी पाकिस्तान की ओर से फैलाया जा रहा है. पड़ोसी मुल्क और वहां के आतंकी संगठनों का टारगेट होता है कि किसी तरह घाटी को अशांत किया जाए. बाहरियों समेत कश्मीरी पंडित, भाजपा नेताओं, कार्यकर्ताओं और पुलिस के जवानों को निशाना बनाया जाए जिससे दहशत का माहौल बने. 

खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, आतंकियों और पड़ोसी मुल्क की ओर से इस साजिश के पीछे का एक खास मकसद ये भी है कि भारत सरकार की जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास योजना को प्रभावित किया जाए. 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया था, जिसके बाद घाटी में कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की योजना चलाई जा रही है.

आखिर आतंकियों के निशाने पर कौन?

आतंकियों के निशाने पर गैर मुस्लिम होते हैं. इनमें ज्यादातर बाहर से आने वाले मजदूर और कश्मीरी पंडित शामिल हैं. इनके अलावा, आतंकी भाजपा के कार्यकर्ता और स्थानीय निकायों में चुने गए लोगों को भी टारगेट करते हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, आतंकियों की टारगेट किलिंग लिस्ट में पुलिस के जवान और अधिकारी भी शामिल होते हैं. 

पुलिस के जवान आतंकियों के टारगेट पर क्यों?

बाहरी लोगों, कश्मीरी पंडितों और भाजपा के नेता-कार्यकर्ता तो हमेशा से आतंकियों के टारगेट पर रहे हैं, लेकिन आतंकी स्थानीय पुलिस के जवानों (मुस्लिम भी शामिल) को आखिर क्यों निशाना बनाते हैं? इसके पीछे के कारणों के बारे में खुफिया एजेंसी का मानना है कि जम्मू-कश्मीर सरकार में जो स्थानीय लोग काम करते हैं, उन्हें आतंकी भारत सरकार का करीबी और अपना दुश्मन समझते हैं, इसलिए स्थानीय गैर हिंदुओं को भी निशाना बनाया जाता है. 

30 दिसंबर 2023 को जम्मू-कश्मीर के पुलिस महानिदेशक यानी डीजीपी आरआर स्वैन ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और जानकारी दी कि 2023 में जम्मू-कश्मीर में नागरिक हत्याओं और बलों पर हमलों में काफी कमी आई है. उन्होंने बताया कि जम्मू क्षेत्र में सक्रिय आतंकवादियों की संख्या घटकर दोहरे अंक (31) पर आ गई है.

डीजीपी ने बताया कि....

  • 2023 में जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों में 55 विदेशियों समेत कुल 76 आतंकवादी मारे गए. 
  • 2022 में टारगेट किलिंग की 31 घटनाएं सामने आई थीं. इसके मुकाबले 2023 में टारगेट किलिंग की 14 घटनाएं सामने आईं, जिसमें चार पुलिसकर्मियों को भी निशाना बनाया गया.
  • जम्मू-कश्मीर में 89 आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया गया.
  • 2021 में घाटी में 182 आतंकियों को ढेर किया गया था, जबकि आतंकी हमलों में 35 नागरिक मारे गए थे.

घाटी में कितने हिंदू कर्मचारी?

आंकड़ों के मुताबिक, घाटी में करीब 5,900 हिंदू कर्मचारी रहते हैं. इनमें से करीब 1100 ट्रांजिट कैंपों, जबकि 4700 अपने-अपने घरों में रहते हैं. इनमें से अब अधिकतर टारगेट किलिंग के भय के कारण कश्मीर छोड़कर जम्मू में शरण ली है. हालांकि, पुलिस और सुरक्षाबल लगातार बाकी बचे हिंदू परिवारों से उनकी सुरक्षा का वादा करते हैं. 

आखिर कैसे रोकी जा सकती है टारगेट किलिंग?

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, घाटी में टारगेट किलिंग को रोकने के लिए खुफिया और लोकल नेटवर्क को एक्टिव करना होगा. साथ ही इसे काफी एडवांस और मजबूत करना होगा. संवेदनशील इलाकों में लगातार पैट्रोलिंग की जानी चाहिए.

घाटी में कौन-कौन से जिले शामिल?

घाटी यानी कश्मीर में अनंतनाग, बारामूला, बडगाम, बांदीपोर, गांदरबल, कुपवाड़ा, कुलगाम, पुलवामा, शोपियां और श्रीनगर जिला आता है. पूरे घाटी में मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, इनकी आबादी 97.16 फीसदी है. बाकी अन्य में 1.84% हिंदू, 0.88% सिख, 0.11% बौद्ध और अन्य हैं. 

 

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First Published : 09 February 2024, 08:06 AM IST