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मीडिया ट्रायल को लेकर गाइडलाइन बनाए सरकार, प्रभावित हो रहा है न्याय: Supreme Court

Supreme Court Media Trial: CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि मीडिया ट्रायल से न्याय प्रशासन प्रभावित हो रहा है. पुलिस में संवेदनशीलता लाना जरूरी है.

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Amit Mishra
मीडिया ट्रायल को लेकर गाइडलाइन बनाए सरकार, प्रभावित हो रहा है न्याय: Supreme Court

Supreme Court On Media Trial: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने आपराधिक मामलों में मीडिया ट्रायल को लेकर कड़ रुख दिखाया है. सर्वेच्च अदालत ने केंद्र सरकार से पुलिस विस्तृत गाइडलाइन बनाने को कहा है. 2 महीने में मीडिया ब्रीफिंग को लेकर मैन्यूअल तैयार करने के निर्देश भी दिए हैं साथ ही 3 महीने में विस्तृत मैन्यूअल तैयार करने के निर्देश दिए हैं. अब इस मामले में जनवरी 2024 के दूसरे हफ्ते में सुनवाई होगी. केंद्र की ओर से ASG ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि सरकार मीडिया ब्रीफिंग को लेकर दिशानिर्देश तय करेगी. सरकार कोर्ट को उससे अवगत कराएगी.

प्रभावित हो रहा है न्याय प्रशासन

आपराधिक केस में पुलिस की ओर से मीडिया ब्रीफिंग के लिए दिशानिर्देश तय किए जाने को लेकर सुनवाई के दौरान CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि मीडिया ट्रायल से न्याय प्रशासन प्रभावित हो रहा है. पुलिस में संवेदनशीलता लाना जरूरी है. जांच के ब्यौरे का खुलासा किस चरण में हो ये तय करने की जरूरत है. ये महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें पीड़ितों और आरोपी का हित शामिल हैं, साथ ही बड़े पैमाने पर जनता का हित भी शामिल है.  

शामिल होते हैं कई पहलू

CJI ने कहा अपराध से जुड़े मामलों पर मीडिया रिपोर्टिंग में सार्वजनिक हित के कई पहलू शामिल होते हैं. बुनियादी स्तर पर बोलने और अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार सीधे तौर पर मीडिया के विचारों, समाचारों को चित्रित करने और प्रसारित करने के अधिकार दोनों के संदर्भ में शामिल है. हमें मीडिया ट्रायल की अनुमति नहीं देनी चाहिए.  दरअसल,

तय करें दिशानिर्देश

CJI चंद्रचूड़ ने सरकार से कहा है कि वो 3 महीने में मीडिया ब्रीफिंग के लिए पुलिस को प्रशिक्षित करने के लिए दिशानिर्देश तय करे. हमें आरोपी के अधिकार का भी ध्यान रखना है. एक स्तर पर, जिस आरोपी के आचरण की जांच चल रही है, वो निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच का हकदार है. मीडिया ट्रायल से उनका हित प्रभावित होता है. किसी आरोपी को फंसाने वाली मीडिया रिपोर्ट अनुचित है. पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग से जनता में ये संदेह भी पैदा होता है कि उस व्यक्ति ने कोई अपराध किया है. मीडिया रिपोर्ट पीड़ितों की निजता का भी उल्लंघन कर सकती हैं. किसी मामले में पीड़ित नाबालिग हो सकता है.

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