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Kasturba Gandhi: जब कस्तूरबा ने महात्मा गांधी की बातों को मानने से किया था इंकार, पत्नी से ज्यादा थी 'बा' की पहचान

Kasturba Gandhi Birth anniversary: कस्तूरबा गांधी को आमतौर पर महात्मा गांधी की पत्नी के रूप में ही जाना जाता है लेकिन उनका जीवन इससे कही अधिक था. आइए, उनके जीवन पर एक नजर डालें और देखें कि कैसे उन्होंने गांधी के साथ मिलकर भारतीय समाज को बदलने में अहम भूमिका निभाई.

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Kasturba Gandhi: जब कस्तूरबा ने महात्मा गांधी की बातों को मानने से किया था इंकार, पत्नी से ज्यादा थी 'बा' की पहचान

Kasturba Gandhi Birth anniversary: कस्तूरबा गांधी का नाम इतिहास में महात्मा गांधी की पत्नी के रूप में दर्ज है, लेकिन उनका जीवन इससे कहीं अधिक व्यापक और प्रेरणादायक है. वह गांधी के जीवनसाथी होने के साथ-साथ उनके संघर्षों में मजबूत सहारा और सामाजिक परिवर्तन की यात्रा में एक निपुण सहयोगी रहीं. आइए, उनके जीवन और कार्यों को गहराई से देखें, और समझें कि कैसे उन्होंने भारतीय समाज को नया रूप देने में अहम भूमिका निभाई.

बाल विवाह से स्वतंत्रता संग्राम तक का सफर

कस्तूरबा का जन्म 11 अप्रैल 1869 को हुआ था. उस समय की सामाजिक परिपाटी के अनुसार, मात्र सात वर्ष की आयु में ही उनका बाल विवाह मोहनदास गांधी (बाद में महात्मा गांधी) से कर दिया गया. उनका प्रारंभिक जीवन पारंपरिक ढर्रे में ही बीता, लेकिन उनके भीतर सामाजिक सरोकारों की ज्वाला हमेशा प्रज्वलित रही. गांधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान, कस्तूरबा उनके साथ रहीं. वहां उन्होंने रंगभेद का विरोध किया और भारतीय समुदाय को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 1913 में भारतीयों पर लगे अनुचित कर के खिलाफ हड़ताल का नेतृत्व कर जेल जाना, यह किसी भी आंदोलन में महिलाओं के अग्रणी स्वरूप का एक शुरुआती उदाहरण था.

असहमति की बुलंद आवाज

हालांकि गांधी समाज सुधारक थे, परंतु उनके कुछ विचार कस्तूरबा को स्वीकार नहीं थे. गांधी के अहिंसा और त्याग के सिद्धांतों का कस्तूरबा पूरी तरह समर्थन करती थीं, लेकिन उनके रूढ़िवादी विचारों, खासकर महिलाओं के पहनावे और पर्दे को लेकर उनकी असहमति थी. कस्तूरबा ने हमेशा खादी साड़ी पहनने से इनकार किया और अपना अलग मत रखने की स्वतंत्रता को बनाए रखा. यह उनके मजबूत व्यक्तित्व और स्पष्ट विचारों को दर्शाता है.

स्वतंत्रता आंदोलन में अग्रणी भूमिका

भारत वापसी के बाद कस्तूरबा गांधी स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से शामिल रहीं. उन्होंने असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया. इन्हीं आंदोलनों में भाग लेने के कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा. जेल में रहते हुए भी उन्होंने असमान परिस्थितियों का विरोध किया और भेदभावपूर्ण व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाई. उन्होंने जेल के भीतर ही महिलाओं को संगठित किया और उन्हें चरखा चलाने एवं  स्वावलंबी बनने का प्रशिक्षण दिया.

एक अनोखी साझेदारी और स्थायी विरासत

कस्तूरबा गांधी और महात्मा गांधी की साझेदारी भारतीय इतिहास में एक अनूठी मिसाल है. जहां एक ओर गांधी ने राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व किया, वहीं दूसरी ओर कस्तूरबा ने जमीनी स्तर पर बदलाव लाने का काम किया. उन्होंने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए खादी आश्रमों की स्थापना की और समाज सुधार कार्यों में अग्रणी भूमिका निभाई. उनका जीवन सादगी, त्याग और सामाजिक परिवर्तन के लिए समर्पित था.

कस्तूरबा गांधी का 1944 में निधन हो गया. उन्होंने साबित किया कि एक महिला परंपराओं से बंधे रहने के बजाय, उन्हें चुनौती देकर भी समाज में बदलाव ला सकती है. उन्हें न सिर्फ गांधी की पत्नी के रूप में, बल्कि एक स्वतंत्र विचार वाली क्रांतिकारिणी के रूप में याद किया जाना चाहिए.