Ayodhya Ke Ram: यहां रुकी थी माता सीता की डोली, आज भी मौजूद हैं साक्ष्य

Ayodhya Ke Ram में आज हम आपको एक ऐसी जगह के बारे में बताने जा रहे हैं जहां माता सीता की डोली रुकी थी. भगवान राम से विवाह के बाद जब भगवान राम के साथ माता सीता अयोध्या के लिए निकली तो जनकपुर से 38 किलोमीटर दूर पंथपाकर नाम के जगह पर विश्राम के लिए रुकी थी.

रंजीत पूर्वे सीतामढ़ी
Purushottam Kumar

आदित्य कुमार/नोएडा: सालों तक माता सीता और राम टेंट में रहने को मजबूर हुए. अब अयोध्या में उनके लिए पक्के का घर बनकर तैयार हो गया है. 22 जनवरी को भगवान राम और सीता अपने नए घर में आ जाएंगे. ऐसे में  हम आपको बताते हैं उस स्थान के बारे में जहां पर माता सीता की डोली रुकी थी, और वहां पर माता सिया ने राम से अपने मायके वालों के लिए वरदान मांगा था. त्रेता युग से वो पवित्र स्थान आज भी मौजूद हैं, अब उस स्थान पर मंदिर बना दिया गया है और लोग उसकी पूजा करते हैं.

विशाल पेड़ के नीचे रुकी थी माता सीता की डोली

भगवान राम की शादी राजा जनक की पुत्री जानकी से हुई थी. त्रेता युग में राजा जनक मिथिला क्षेत्र (विदेह राज्य) के राजा थे जो अब बिहार और नेपाल के कुछ हिस्से में पड़ता है. जनश्रुतियों के अनुसार जब भगवान राम और माता सीता की शादी हुई. तो पूरा मिथिला प्रदेश खुश था. उत्सव का माहौल था. राम शरण अग्रवाल माता सीता की जन्मस्थली माने जाने स्थान सीतामढ़ी के रहने वाले हैं. वो बिहार के कल्चर पर शोध कार्य कर रहे हैं. वो बताते हैं कि राम भगवान की विवाह मिथिला में हुई थी, अब वो जगह नेपाल का जनकपुर पड़ता है.

मिथिला के जनश्रुतियों के अनुसार विवाह के बाद जब भगवान राम के साथ माता सीता अयोध्या के लिए निकली तो जनकपुर से 38 किलोमीटर दूर पंथपाकर नाम के जगह पर विश्राम के लिए रुकी थी. रात्रि विश्राम के बाद सुबह वहां से अयोध्या के लिए निकली. राम शरण बताते हैं कि आज भी वो जगह पूजनीय हैं, लोग उस स्थान पर अपनी मन्नते पूरी करने के लिए जाते हैं.
 


sita doli sthal- फ़ोटो क्रेडिट: रंजीत पूर्वे सीतामढ़ी

लोकगीत में मिलती है सीता के अयोध्या जाने की झलक

गायत्री सिन्हा दरभंगा की रहने वाली हैं गीतकार हैं, बिहार के लोकगीत और जनश्रुतियों पर शोध कार्य कर रही है. गायत्री बताते हैं कि मिथिला के लोकगीतों में माता सीता के अयोध्या जाने की बात सामने आती है. एक लोककथा के अनुसार जनकपुर से अयोध्या के लिए चलते हुए जब शाम हो गई. तो पंडौल गांव में विशाल पंथपाकर (बरगद को मिथिला में इसी पंथपाकर कहते हैं) का पेड़ देखकर राम भगवान ने सिया की डोली वहीं रखने और विश्राम करने का सोचा. सुबह जब चलने की बारी आई तो डोली उठ नहीं पा रहा था. गायत्री बताती है कि जनश्रुति के अनुसार भगवान राम को यह जानकारी मिली तो उन्होंने सिया से इस बारे में पूछा. तो सिया ने अपने राज्य मिथिला के कल्याण का वरदान मांगा. भगवान राम ने उनकी बात मानकर मिथिला क्षेत्र को वरदान दिया कि इस क्षेत्र का कल्याण हो.

बिहार सरकार के पर्यटन स्थल में है शामिल 

बिहार के उत्तरी जिले सीतामढ़ी ( विष्णु पुराण के अनुसार माता सीता की प्राकट्य स्थली) से आठ किलोमीटर दूर पंडौल गांव को बहुत आदर से देखा जाता है. अब उस जगह को पंथपाकर भी कहते हैं, बिहार सरकार के पर्यटन विभाग ने इस जगह को पंडौल और पंथपाकर नाम से चिन्हित किया है. अब उस जगह पर विशाल बरगद का पेड़ हैं और मंदिर भी बनाया गया है. माता सीता की पूजा की जाती है उस स्थान पर.
 

Panthpakar- फ़ोटो क्रेडिट: रंजीत पूर्वे सीतामढ़ी- फ़ोटो क्रेडिट: रंजीत पूर्वे सीतामढ़ी