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Lok Sabha Elections 2024: वादे तेरे वादे! आखिर कितना होगा खर्च, कहां से आएगा पैसा? Freebies की फुल कहानी

Lok Sabha Elections 2024: भाजपा और कांग्रेस, लोकसभा चुनाव के लिए घोषणापत्र जारी कर चुकी हैं. दोनों पार्टियों ने चुनाव के लिए कई लोकलुभावन वादे भी किए हैं, जिसे लेकर पार्टियां एक दूसरे पर फ्रीबीज का आरोप लगाती रहीं हैं. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था, जिसे मुफ्त की रेवड़ी भी कहा गया था. सवाल ये कि भाजपा, कांग्रेस ने जो अपने वायदे किए हैं, उन वादों को पूरा करने के लिए आखिर पैसा कहां से आएगा?

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Lok Sabha Elections 2024  BJP vs Congress Freebies
Courtesy: सोशल मीडिया.

Lok Sabha Elections 2024: बात विधानसभा चुनाव की हो या फिर लोकसभा चुनाव की, क्षेत्रीय से लेकर राष्ट्रीय पार्टियां जनता के लिए कई वादे करती हैं. चुनाव जीतने के बाद इन वादों को पूरा करने का प्रेशर भी होता है. कुछ वादे तो पूरे हो जाते हैं, लेकिन इसका असर देश और राज्य सरकारों के खजाने पर पड़ता है. सीधे और सरल शब्दों में कहे तो इसका असर आम जनता पर पड़ता है. सवाल ये कि आखिर फ्रीबीज का वादा करने वाली पार्टियां आखिर इन वादों को पूरा करने के लिए पैसा कहां से लाएंगी. जाहिर है कि सरकारों के पास पैसा जनता की ओर से चुकाए गए टैक्स के जरिए आता है. जो सरकार सत्ता में आएगी, इन पैसा का यूज इन वादों को पूरा करने में करेगी.

फ्रीबीज की चर्चा पिछले साल सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची थी. सुप्रीम कोर्ट भी कह चुकी है कि टैक्सपेयर यानी कि आम जनता के पैसों का इस्तेमाल फ्रीबीज में होने से सरकारें दिवालियापन की खाई में गिर सकती हैं. सुप्रीम कोर्ट के अलावा RBI यानी कि रिजर्व बैंक भी कह चुका है कि मुफ्त वाली योजनाओं पर खर्च करने वाली सरकारें कर्ज के जाल में फंसती जा रही हैं. दरअसल, 2022 में भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय की ओर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी. मांग की गई थी कि मुफ्त की रेवड़ी यानी फ्रीबीज बांटने का वादा करने वाली पार्टियों की मान्यता रद्द होनी चाहिए. उनका कहना था कि ये एक तरह से वोटर्स को रिश्वत देने जैसा है. इससे सरकारी खज़ाने पर बोझ पड़ता है. 

आइए, समझते हैं कि लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा और कांग्रेस ने क्या-क्या वादे किए हैं?

कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में गरीब महिलाओं को बिना शर्त 1 लाख रुपए सालाना देने वाली महालक्ष्मी योजना चलाने की बात कही गई है. इसके अलावा, बुजुर्गों को पेंशन देने, ट्रेन की टिकटों पर छूट, सभी को 25 लाख रुपये तक का हेल्थ इंश्योरेंस आदि शामिल है. इसके अलावा, यूथ्स के लिए नेशनल अप्रेंटिसशिप की भी बात कही गई है, जिसमें डिप्लोमा और ग्रैजुएट यूथ्स को हर साल 1 लाख रुपये देने का वादा है. साथ ही 15 मार्च 2024 तक एजुकेशन लोन माफ करना, 30 लाख सरकारी नौकरी, खिलाड़ियों को 10 हजार रुपये की हर महीने मदद और न्यूनतम मजदूरी को 400 रुपये करने की भी गारंटी दी गई है.

अब बात भाजपा की. भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में 70 से ज्यादा उम्र के सभी बुजुर्गों को हेल्थ कवर, गरीबों के लिए 3 करोड़ घर, 5 साल तक गरीबों को मुफ्त राशन, जन औषधि केंद्र पर 80 फीसदी सस्ती दवा, मुद्रा योजना के तहत 20 लाख का लोन, पाइप लाइन से घर-घर LPG गैस, करोड़ों परिवारों को मुफ्त बिजली, गरीबों को मिलेगी पोषण वाली थाली, 10 करोड़ किसानों को किसान सम्मान निधि के अलावा कई अन्य वादे किए गए हैं. 

अब भाजपा और कांग्रेस की ओर से जो ये वादे किए गए हैं, अगर सरकार आती है, तो इसके लिए लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करने होंगे. हालांकि, ये साफ नहीं है कि इन योजनाओं का लाभ कितने लोगों को मिलेगा, लिहाजा कितने लाख करोड़ रुपये इन फ्रीबीज पर खर्च होंगे, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है, लेकिन फिर भी विशेषज्ञों की मानें तो वादों को पूरा करने में आने वाली खर्च का आंकड़ा लाखों करोड़ में हो सकता है.  

खर्च को एक उदाहरण से ऐसे समझें

कांग्रेस ने गरीब परिवार की महिलाओं को सालाना 1 लाख रुपये देने का वादा किया गया है. अगर इसे 15 करोड़ गरीब परिवारों के लिहाज से देखें तो साल में कांग्रेस को 15 लाख करोड़ रुपये खर्च करने होंगे. इसी लिहाज से सरकारी नौकरी, छात्रों की कर्ज माफी, योजनाओं को लागू करने के लिए करीब 10 से 12 लाख करोड़ का खर्च आ सकता है. दोनों आंकड़ों को जोड़ दिया जाए तो सलाना खर्च 25 से 27 लाख करोड़ आता है. गौर करने वाली बात ये कि देश का बजट ही 47 लाख करोड़ का है. ऐसे में आप खुद अंदाजा लगा लीजिए कि फ्रीबीज बांटने के लिए पैसे कहां से आएंगे?

फ्रीबीज की शुरुआत कैसे और कब हुई? 

माना जाता है कि इसकी शुरुआत तमिलनाडु से हुई. 2006 में तमिलनाडु में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान डीएमके ने घर-घर मुफ्त में टीवी बांटने का ऐलान कर दिया गया. तर्क दिया गया कि महिलाएं और बच्चे एजुकेटेड होंगे. DMK सरकार को इस वादे को पूरा करने में 750 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े. 

क्या जनकल्याणकारी योजनाएं भी फ्रीबीज हैं?

हालांकि फ्रीबीज के संबंध में स्पष्ट परिभाषा नहीं है क्योंकि अगर विपक्ष पार्टी कोई वादा करती है, तो सत्ता पक्ष उसे फ्रीबीज या मुफ्त की रेवड़ी करार देता है. वहीं अगर सत्ता पक्ष ऐसे वादे करती है, तो इसे जनकल्याणकारी योजना बताती है. मामला जब सुप्रीम कोर्ट में गया था तब चुनाव आयोग ने कहा था कि आपदा, महामारी के वक्त अगर मुफ्त में जरूरत की चीजें बांटी जाए तो ये मुफ्त की रेवड़ी या फ्रीबीज नहीं है. इसके अलावा, आम दिनों में बांटा जाने वाला जरूरत का सामान फ्रीबीज हो सकता है. 

इसे ऐसे भी समझें कि 1960 के दशक में तमिलनाडु में बच्चों को स्कूल में मुफ्त में खाना दिए जाने की योजना शुरू हुई, जिसे केंद्र सरकार ने भी अपनाया, जिसे हम मिड-डे मील के नाम से जानते हैं. इसके अलावा, आंध्र प्रदेश में फ्री राशन योजना एनटी रामाराव के शासन काल में शुरू हुई, जिसमें मुफ्त 2 किलो चावल दिया जाता था. इस योजना को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया गया जिसे हम नेशनल फूड सिक्योरिटी प्रोग्राम के नाम से जानते हैं. कुछ साल पहले ही यानी साल 2018 में तेलंगाना के सीएम ने किसानों के लिए 10 हजार रुपये की सालाना मदद देने की योजना शुरू की, जिसके तर्ज पर 2019 से देश के किसानों को पीएम किसान सम्मान निधि दिया जाता है.

सब ठीक तो फिर गलत क्या? 

जानकारों की मानें तो जो जनता की भलाई से जुड़ी हो, उसे फ्रीबीज में नहीं लिया जा सकता. एक हद तक इसे कहे कि अगर कोई जरूरतमंद है, तो उसके लिए योजना ठीक है, लेकिन जो जरूरतमंद नहीं है और उसे भी इसका लाभ मिल रहा है, तो इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है. मुफ्त की बिजली मामले में ऐसा ही होता है. कई सरकारें मुफ्त बिजली या सब्सिडी देने की बात कहती है. इस योजना से मुफ्त बिजली दी तो जाती है, लेकिन बिजली कंपनियों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है.