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अरबों की संपत्ति छोड़ लोग बन जाते हैं संन्यासी, जानें क्यों खास है जैन धर्म की तपस्या?

आजकल कई युवा और किशोर उम्र के बच्चों का भी सांसारिक जीवन से मोहभंग हो रहा है. ये बच्चे जीवन में वैराग्य का रास्ता चुन रहे हैं. कई लोग तो अरबों की संपत्ति को त्याग वैराग्य का मार्ग चुन रहे हैं. अधिकतर लोग वैराग्य के लिए जैन धर्म को ही चुन रहे हैं. आइए जानते हैं कि आखिर जैन धर्म में क्या है ऐसा खास? 

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सांसारिक मोहमाया को त्यागकर लोग वैराग्य की राह चलना शुरू कर रहे हैं. इसके लिए लोग जैन धर्म का सहारा ले रहे हैं. पिछले कुछ सालों में देखा गया है कि लोग ऐशोआराम की जिंदगी को त्याग रहे हैं. वहीं, कुछ अरबों की संपत्ति तो कुछ अपने बने बनाए करियर को लात मारकर जैन धर्म में वैराग्य की दीक्षा ले रहे हैं. 

गुजरात के एक बड़े हीरा कारोबारी की महज 8 साल की बेटी ने जैन धर्म में दीक्षा ग्रहण की. ऐसे ही करोड़ों का पैकेज ठुकराकर 28 साल के एक लड़के ने जैन धर्म की दीक्षा ली. अब वे एक जैन संत हैं. आखिर जैन धर्म में ऐसा क्या है, जिससे प्रेरित होकर लोग वैराग्य धारण कर रहे हैं. 

क्या है जैन धर्म की दीक्षा?

जैन धर्म में दीक्षा लेने का अर्थ सारी भौतिक सुख और सुविधाओं को त्यागकर एक संन्यासी का जीवन बिताते हुए खुद को समर्पित करना है. इसे इस धर्म में चरित्र या महानिभिश्रमण भी कहा जाता है. यह समारोह एक कार्यक्रम होता है, इसमें रीति-रिवाजों के बाद से दीक्षा लेने बाद लड़के साधु और लड़कियां साध्वी बन जाती हैं.दीक्षा लेने के बाद पांच व्रतों का पालन करना पड़ता है. इसमें पहला व्रत है अहिंसा, दूसरा है सत्य और तीसरा व्रत है अस्तेय, चौथा है ब्रह्मचर्य व पांचवां व्रत अपरिग्रह है. 

दीक्षा लेने से पहले और बाद में साधु और साध्वियों को घर, कारोबार, महंगे कपड़े, ऐशोआराम आदि जिंदगी को छोड़कर पूरी तरह से संन्यासी जीवन में डूब जाना पड़ता है. इस क्रिया के आखिरी चरण में सभी साधु और साध्वियों को अपने बाल हाथों से नोचकर सिर से अलग करने होते हैं.इसको केशलोंच कहते हैं. इसमें साध्वी सफेद रंग की सूती साड़ी पहनती हैं और साधु पूरी तरह से कपड़ों का त्याग कर देते हैं. 

दीक्षा के बाद ऐसा होता है जीवन

दीक्षा लेने के बाद से व्यक्ति को संन्यासी जीवन में आना पड़ता है. सूर्यास्त के बाद साध्वियां और साधु अन्न का एक दाना भी नहीं खाते हैं न ही एक बूंद पानी पीते हैं. सूर्योदय होने के करीब 48 मिनट बाद ही पानी पीते हैं. 

भिक्षा मांगकर करते हैं भोजन

जैन साधु अपने लिए कभी भोजन नहीं पकाते हैं. न ही उनके लिए आश्रम में कोई भोजन बनाया जाता है. ये लोग घर-घर जाकर भोजन के लिए भिक्षा मांगते हैं. इस प्रथा को गोचरी कहा जाता है. ये लोग एक साथ बहुत सारा भोजन नहीं ले सकते हैं. ये जिस घर में भी भिक्षा मांगने जाते हैं, वहां पर इस बात का ख्याल रखा जाता है कि वहां शाकाहारी भोजन बनता हो. 

क्यों खास है यह धर्म?

इस धर्म को इस कारण खास माना गया है क्योंकि इसमें सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव की हत्या करना भी पाप होता है. इस कारण जैन मुनि खुद को कष्ट देकर उन जीवों के जीवन को बचाते हैं. इसके साथ ही ये लोग दूसरों के लिए अपने पूरे जीवन को समर्पित कर देते हैं. इनका पूरा जीवन परोपकार के प्रति समर्पित रहता है. 

Disclaimer : यहां दी गई सभी जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है.  theindiadaily.com  इन मान्यताओं और जानकारियों की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह ले लें.